Monday, 10 December 2012

ओरछा बेतवा और मैं....



 मैं वहाँ पहुचा ही था ......कि हवा ने मुझे छुआ .. मेरे गालो को सहलाते हुये बोली आओ, आ जाओ  ....... तभी चारों ओर के पेड़ कोलाहल करने लगे ....... और शांत हो गये ....शायद किसी बुजुर्ग पेड़ ने मुझे पहचान लिया था और बता दिया था ...कि अरे तो वही है ....जो पहले बच्चा हुआ करता था .... हां उम्र तो बड़ी है पर थोड़ा बच्चा और हो गया है ..........मुझे लगा सभी पेड़ खिलखिला दिए ........पर मैंने देखा तो मुस्कुराने लगे ..........

 अभी पेडो ने मुझे घूरना बन्द किया ही था ....कि बूढ़ऊ द्वारे ने मुझ पर नज़र डाली .......और विनम्र होकर अंदर जाने का रास्ता दिया .........और जाते जाते बोल उठा ....... कैसे हो .....मैंने उसे देखा ....तो बोला भाई भूल गये क्या ...पहचाना नहीं हमें .... मैंने कहा तुम बिलकुल नहीं बदले ........ उसने कहा बदल जाता तो तुम अंदर नहीं आते ..... मैं आगे बड गया और सोचा .....हां तुम बदल भी नहीं सकते ....द्वारे ने फिर कहा द्वार कभी नहीं बदलते बेटा ..वो बस खुलते है ........ मैंने पलट के देखा तो फिर मुस्करा कर बोला ..जाओ ....... आगे एक मन्दिर था ....  लाल, गुलाबी, पीला  ......... मैंने मन्दिर से पूछा ये रंग कहाँ से लिये ...... मन्दिर बोला सूरज आता है देने ........ यही तो बैठता है ......दरी बिछा कर ठीक मेरे दाई ओर ..... मैंने दाई ओर  देखा तो सचमुच एक लड़का गुलाब और गेंदे की मालाये, सिंदूर और अगरबत्ती लिये बैठा था ....मैं पूछा तुम सूरज हो क्या ......लड़का मुस्कुरा दिया बोला भैया प्रसाद लोगे पाँच रूपए का है ..... मैंने प्रसाद लिया .....लड़का चमक उठा ..... शायद सूरज ही होगा .... लड़का बोल उठा भैया अगरबत्ती भी ले लों ना ...मेरे घर में मैं ही हूँ कमाने वाला कुछ पैसे और मिल जायेगे ....मैं अगरबत्ती ली ..........लड़का सचमुच सूरज था ....लड़का थोड़ा और चमक उठा ........


 आगे राजा राम, सिंहासन पर बैठे थे ...मैंने उन्हें देखा ......उन्होंने भी मुझे देखा ....... मैंने कहा सिंहासन अच्छा है मैं बैठ सकता हूँ?..... राम ने पूछा...तुम राम हो ?? ...मैंने कहा नहीं ........राम ने कहा पहले राम बनो फिर बैठ सकते हो ........ मैंने फिर पूछा तो क्या मैं राम बन सकता हूँ?? .......राम ने कहा हां हां क्यू नहीं कोशिश करो ...... मैंने कहा जी ......राम मुस्कुराने लगे ..... राम ने फिर पूछा तुम कौन हो? ...... मैंने कहा हिन्दू हूँ मैंने सोचा राम खुश हो जायेगे.....राम हँसने लगे ...... मैंने राम से पूछा हँसे क्यू ?? ...राम ने कहा ..... सिंहासन पर राम बैठा करते है, राजा बैठा करते है हिन्दू या मुसलमान नहीं ............ऐसे बनोगे राम .........मैं उदास हो गया ...... राम ने कहा कोई बात नहीं ...... अपनी गलतियों से सीखो ......बन जाओगे ........अब जाओ मुझे और लोगो से भी बात करनी है .....उन्हें भी राम बनाना है ...
मैं आगे चल दिया ........मुझे किला मिला उसने मिलते ही पूछा कहानी सुनोगे ....... मैंने कहा हां हां सुनाओ सुनाओ ....किले ने कहा कहानी लंबी है .......क्या तुम बैठ कर सुनोगे .मैंने कहा हां ........हम दोनों आमने सामने बैठ गये ........किले ने कहानी सुनाई ....चंदेलो की कहानी .....फिर बुंदेलो की कहानी .......भारती चन्द्र की कहानी .......अकबर की कहानी .....मधुकर शाह की कहानी.......जहाँगीर की कहानी.........वीरसिंह बुंदेला की कहानी.........अबुलफजल की कहानी .....शाहजहां की कहानी .....जुझार सिंह की कहानी ..........हरदौल की कहानी ........छत्रसाल की कहानी.......... जहांगीर महल की कहानी.. ... राज महल की कहानी.... रामराजा मंदिर की कहानी.... राय प्रवीन महल की कहानी.... इन्द्रमणि की कहानी........ लक्ष्मीनारायण मंदिर की कहानी .....चतुर्भुज मंदिर की कहानी........ फूलबाग की कहानी......सुन्दर महल की कहानी.....और आखिर में ...केशवदास का काव्य ...........फिर बेतवा की कहानी ......मैंने कहा रुको भाई मैं सुनते सुनते हाफ गया ........ठीक है .....मैंने पूछा क्या मैं इन सब से मिल सकता हूँ .....किले ने कहा नहीं ....मैंने पूछा क्यू नहीं ....किले ने कहा सब चले गये, तुम रुकोगे .....मैंने कहा नहीं मुझे जाना होगा ......किले ने कहा इन्हें भी जाना था .... मैंने कहा ओह, फिर अब मैं क्या करू??........ किला बोला जाओ बेतवा से मिल आ आओ एक वही है जो हमेशा चलती रहती है पर जाती कहीं नहीं ......
मैं बेतवा के पास जाने लगा ....... रास्ते में गाँव मिला ...... गाँव मुझे धूमना चाहता था ....... गाँव बोला चलो मेरे साथ ....मैं साथ चल दिया ........ सबसे पहले कुछ खपरेल मिलने आये .......फिर एक अथाई ......पीछे देखा तो बरगद, नीम और लंका वाले हनुमान जी आ रहे थे ....... दाई ओर से हरदौल की रंगोली ओढें एक दीवार इठला रही थी ...... फिर मजार बाले बाबा मिलने आये .......फिर शिव जी, पार्वती जी, गणेश जी कार्तिक जी, नंदी और शिवगण ........ आगे माता जी ......फिर दो चूल्हे ........सामने से चार पाँच दुकाने ....... एक कुआ ...... पीपल वाला भूत ........दो बैल, गाड़ी सहित ......मिट्टी के खिलौने ........और आखिर में बेतवा का  पुल ....अब सारा गाँव मुझे देख चुका था ... पुल मुझे देख रहा था ....और मैं उसे .....पुल ने मुझ से पूछा ......उस पार जाओगे .......मैंने कहा हाँ ........ पुल ने मुझ से फिर पूछा ....राजा जी से मिले ..मैंने कहा हां ....... पुल ने मुझ से फिर पूछा और किस से मिले .....मैंने कहा किले से, द्वारे से, मन्दिर से और गाँव से ........मैंने पूछा तुम उस पार कैसे ले जाते हो .......पुल ने कहा ....मैं पुल हूँ, मेरा यही काम है, दो किनारों को जोड़ना, जो कभी नहीं मिलते उन्हें मिलाना, रिश्तों में बांधना ........ ये मैं कैसे करता हूँ नहीं जानता ............ये तो जोड़ते जोड़ते अपने आप आता है ...... मैं कहा बड़ा अच्छा काम है तुम्हारा ........पुल बोला बिलकुल ........मैंने पूछा क्या मैं पुल बन सकता हूँ .....पुल ने कहा हां, क्यू नहीं, कोशिश करो .....मैंने पूछा कैसे ........ पुल ने कहा दिल जोड़ के देखो, अपने ऊपर से सब को जाने, दो किसी को भी मत रोको, स्थिर रहो, अडिग रहो, मजबूत रहो ........तभी मैंने सुना किसी ने जोर की आवाज दी पुल से क्या बात करते हो ....मुझे भूल गये क्या ....पुल चुगलखोर है ....इसे शिकायत करने के सिवा कुछ नहीं आता .......और तुम मुझ से मिलने आये हो या पुल से....

मैंने देखा तो बेतवा मुझे पुकार रही थी ..........पुल ने कहा जाओ उस से मिल लों .....वों पागल है ......मैंने पूछा कैसे .......पुल ने कहा वों उन्मुक्त है, आजाद है, उसे बहना आता है ...सो इतराती है .........वों पूरी पागल है ........मैं बेतवा के पास पंहुचा ....बोली बैठ जाओ .........मैं बैठ गया ........ बेतवा आदेश देती है ...... बेतवा ने पूछा कैसे हो ......अच्छा हूँ मैंने कहा ....... बेतवा बोली अच्छे ही रहना ..... पुल भी अच्छा है पर मुझे उसे चिढाने में मजा आता है .....एक वों ही है जो मुझ से बात करता है .......बाकि सब मिल कर चले जाते है ......... मैंने कहा किला भी तो है, गाँव भी है और राजा राम भी .....फिर तुम से बात करने वाले तो बहुत लोग है ........ बेतवा बोली हा है तो .....पर किला बुढा हो चुका है और राजा जी को लोगो का न्याय करने से फुर्सत नहीं है.......गाँव को अपनी ही चिंता है .........एक पुल ही है जो मुझ से बतियाता है ........खैर तुम बताओ ........क्या तुम रुकोगे हमेशा मेरे पास ......मैं कुछ बोलता उस से पहले बेतवा बोल उठी ..... नहीं रुकोगे ...कोई नहीं रुकता भाई ...... ना चंदेल रुके, ना बुंदेले,  ना भारती चन्द्र, ना मधुकर शाह, ना वीरसिंह और ना ही हरदौल, ना रुकी राय प्रवीन.....मैंने कहा तुम तो हो बेतवा .....भला तुम से कौन जीत पाया है ........ बेतवा तपाक से बोली कोई नहीं ....हम दोनों मुस्कुरा दिए ....मैं इधर उधर देखने लगा .... बेतवा बोली आओ मेरे साथ खेलोगे नहीं .... मैं बेतवा की गोद में जाने लगा.... तभी लोगो ने मुझ से कहा ...मत जाओ .... डूब जाओगे ......और वों मुस्कुरा दी ......मैंने सोचा ये तो बिलकुल माँ जैसी है .......... ये क्या डुबोयेगी ........ और हम दोनों फिर खेलने लगे .............खेलते खेलते मैंने पूछा ..... तुम्हारे चारों ओर बड़ी खुबसूरती है बेतवा, कैसे ?........ बेतवा ने कहा खुद को सुन्दर कर लों सब सुन्दर हो जायेगा.......मन में सुंदरता होनी चाहिये बस   .......मैंने देखा उसने पत्थर तराश कर सवांर दिए थे ....... पेडो को हरा कर दिया था ....और कुछ जानवरों को अपने आस पास बुला लिया था ...... कुछ फूल लगा लिये थे .....और एक घाट बना लिया था ....... बेतवा कलाकार है ..... बेतवा चित्रकार है ....... बेतवा मेरे साथ फिर खेलने लगी ........मैंने फिर पूछा बेतवा मुझे बहना सिखाओगी ...... बेतवा ने कहा हा क्यू नहीं, बहना तो बड़ा आसान है ......बस खुद को स्वतंत्र कर दो ....सभी बंधनों को तोड़ दो ........अपने लिये जगह बनाओ .......और उतर जाओ गहराई में ........तुम बहने लगोगे ........मैंने कहा मुझ से नहीं होता ....... बेतवा बोली हो जाएगा धीरे धीरे .......सोचो, मनन करो .......मैंने कहा ठीक है .....तभी बेतवा ने मुझे गुदगुदाना चालू किया ...मैं खिलखिलाने लगा ...... बेतवा भी हँसने लगी ..... बहुत देर तक वो मुझे बच्चों की तरह खिलाती रही.........वो बच्चा बन गई थी ....... मैंने उस से कहा ...अब जाऊ बहुत देर हुई ......... अँधेरा होने को है ...... बेतवा ने कहा जाओ ......मगर फिर आना ..... मैंने कहा बिलकुल आऊंगा ........ बेतवा मुस्कुरा दी ...मैं भी मुस्कुरा दिया ........ मैं जाने लगा ..... बेतवा जोर से चिल्लाई ...आओगे ना ...मैं भी जोर से बोला हां ........ अब मैं पुल पार कर रहा था ..... पुल ने मुझे नहीं रोका ......जाने देना ही उसका काम है ....... हां जाते जाते पूछा जरुर .... बेतवा क्या कह रही थी..... मैंने कहा बस ऐसे ही कुछ खास नहीं ...... पुल बोला जरुर चुगली कर रहि होगी .....मैंने कहा नहीं ......पुल बोला लगता है उसने तुम्हे अपने रंग में ढाल लिया है, मैं तुम्हे पढ़ सकता हूँ .....बेतवा ने तुम्हे बहना सिखाया है .......मैंने कहा हां, पर मुझे बहना आया नहीं है ......पुल बोला आ जायेगा........तभी मैंने देखा सूरज आ रहा था सामने से ....मैं मुस्कुराया पूछा कहाँ जा रहे हो ...बोला भैया शाम होने को है मैं जा रहा हूँ कल फिर आऊंगा, मेरा तो रोज का यही काम है .....फिर सूरज बोला भैया जा भी  रहे है क्या .....मैंने कहा हाँ ....फिर आइयेगा .....मैंने कहा बिलकुल सूरज जरुर आऊंगा .....सूरज बोला अच्छा भैया शुभरात्री...मैंने कहा तुम्हे भी ....हम दोनों मुस्कुराने लगे .........फिर गाँव मिला .....गाँव ने पूछा मिल आये बेतवा से ....... मैंने कहा हाँ .....और पूछा तुम बेतवा का ख्याल क्यू नहीं रखते .......गाँव बोला भाई मैं तो अपना ही ख्याल नहीं रख पा रहा हूँ ........ और बेतवा तो माँ है ....वो सब का ख्याल रखती है ..... अपना भी रख ही लेगी ......मैंने कहा फिर भी ....गाँव बोला कोशिश करूगाँ भाई ........मैं आगे चल दिया ....... मैंने किले से कहा जा रहा हूँ .......किले ने बस हाथ हिलाया ....... बेतवा ने सही कहा था किला बुढा हो चुका है ....... द्वारे और मन्दिर ने एक साथ आवाज लगाईं पूछा कब आओगे ........मैंने कहा जल्द ही ..... उन्होंने कहा ठीक है .......मैंने कहा ख्याल रखना अपना .......दोनों बोले उसके लिये बेतवा तो है .......और हँस दिए ...मैं भी हँसने लगा .... मैं लौट रहा था ......तभी मैंने देखा एक बुढा मेरी तरफ देख कर मुस्कुरा रहा है .......कपड़े फटे पर मुख पर तेज .... मैंने झिझकते हुये पूछा आप कौन है ......बुढा बोला मुझे नहीं पहचाना ...मैं ओरछा हूँ .....बूढ़े ने पूछा  घर जा रहे हो ......मैंने कहा हां ...ठीख है अपना ख्याल रखना ....वहाँ बेतवा नहीं होगी .मैंने कहा जी .......बूढ़े ने कहा खुश रहो .........मैं चला आया .......घर आया तो लगा ......कुछ छूट गया है .......शायद मैं कुछ छोड़ आया हूँ .....देखा तो मन नहीं था मेरा, मेरे पास ......शायद बेतवा ने ...रख लिया ...चोट्टी कहीं की ..... अबकी फिर से जाउगा तो ले आऊंगा .... 
~अमितेष 

Tuesday, 4 December 2012

कहानी : दो पागल थे........


दो पागल थे .......... पता नहीं कब और कैसे पागल हुये ...... लोग बताते थे की पहले दोनों ठीक थे .....काम भी करते थे फिर दोनों में दोस्ती हो गई ..... फिर साथ आना जाना बढ़ गया ...... पहले पहल तो सब ठीक रहा ....फिर एक दिन अचानक दोनों लड़ते हुये मिले, ये इसके कपड़े फाड़ रहा था और वों उसके .......... लोगो ने समझाया के क्या कर रहे हो तो उल्टा जमाने पर बन बैठे .....दोनों इकट्ठा हो गये और लड़ने लगे ज़माने से ......... अगर जमानेवाले कहते कि दिन है तो ये कहते रात है .....अगर जमानेवाले कहते पतझड है तो ये कहते बहार है ........ सूरज को चाँद समझते ......चाँद को खिलौना ...और खिलौनों को तोड़ देते .....खैर थे तो पागल ही कुछ भी कर सकते थे.... पहले तो जमानेवाले ध्यान भी देते थे इनकी बातों पर ........ फिर छोड़ दिया .......कौन पागलो के मुह लगे ...... धीरे धीरे वक्त गुजरता गया ...... और इनका पागलपन बढ़ता गया ............ इनकी मस्ती, खो खो, खी खी, हो हो, हा हा से  जमानेवाले खीझने लगे ........ कोई कहता नाक में दम कर रखा है .....कोई कहता दम तो देखो सालो का ......... कोई कहता पागल है साले .......... एक दिन तो गज़ब हो गया दोनों ने धमाका कर दिया, सब से सच बोलने लगे मोटे से मोटा कहने लगे, गंजे से गंजा कहने लगे, चोर से चोर कहने लगे, गद्दार से गद्दार कहने लगे........ यहाँ तक तो  जमानेवाले सहते रहे लेकिन जब ....सिपाही से चोर बोला और  राजा से गद्दार तो सब को गुस्सा आ गया ....... सब ने एक दूजे की बात मानते हुये .........ये फैसला लिया कि अब पगालो का इलाज कराना जरुरी हो गया है ....... फिर लोगो से राय ली गई कि इलाज कैसे हो .....एक पुजारी बोला इन्हें हनुमान जी के पास ले चलो ..... वों पागलो को ठीक कर देते है ....दोनों की पेशी अगले दिन हनुमान जी के दरबार में हुई ...... हनुमान जी बोले मैं इनका इलाज नहीं कर सकता ......लोगो ने पूछा क्यू प्रभू आप तो सब का इलाज कर सकते है .... भूत पिचास निकट नहीं आवे..... अरे कहते है ना आपकी चालीसा में हम .........हनुमान जी बोले  ..... ये तो पागल है और इनका दिमाग खराब है भाई भूत, राक्षस या असुर होते तो इनका इलाज कर  सकता था   ......... सबने हनुमान जी को नमन किया और फिर से सभा बुलाई ....सभा में फिर से निर्णय हुआ इन्हें पीर बाबा की मजार पर ले चलो ...पीर बाबा ने अच्चो अच्छो को ठीक किया है ..........फिर पीर बाबा के सामने अर्जी लगाईं गई ........पीर बाबा का जबाब भी वही आया जो हनुमान जी ने कहा ......... लोग थोड़े निराश हो गये ....पर इलाज जरुरी था सो फिर सभा बुलाई गयी ..... सब ने फिर से सोचा कि क्यू ना इन्हें वैध जी को दिखाया जाये .........वैध जी  को बुलाया गया, वैध जी को बताया गया कि हनुमान जी और पीर बाबा दोनों ने पागलो इलाज करने से मना कर दिया ..... वैध जी  ने कहा कोई बात नहीं है भाई ये कोई टोना-टोटका या ऊपरी चक्कर तो है नहीं की आदमी के  बस की बात ना हो, आप लोगो ने यूँ ही हनुमान जी और पीर बाबा दोनों को परेशान किया ....भाई विज्ञान भी कोई चीज होती है ......और वैध जी ने इलाज चालू किया ....... राजा ने वैध जी को हर वो वस्तू उपलब्ध कराई जो पागलो के इलाज के लिये जरुरी थी .......वैध जी कहते गये और राजा देता गया ....पागलो का इलाज जोर शोर से जारी था ........... कई दिन बीत गये .....कई महीने बीत गये ........फिर कई साल बीत गये ....... जमानेवालों को पागलो की सुध ना रही ..........फिर अचानक दूर देश से एक खबर आई ...... वहाँ कुछ पागल थे जिन्होंने पूरे देश को पालग कर दिया ...... फिर वहाँ तख्तापलट हो गया ....और पागलो ने सबसे अच्छे पागल को आपना सरताज बना लिया .....अब वहाँ सब पागलपन करते थे .....मस्ती करते थे .... खो खो, खी खी, हो हो, हा हा करते थे ......... अब जमानेवालों को याद आया हमारे यहाँ भी दो पागल थे, क्या हुआ उनका ठीक हुये या नही .....क्या वैध जी सफल हुये ......... जमानेवालों ने फिर सभा बुलाई .......... वैध जी को तलब किया गया ......पूछा गया क्या हुआ पागलो का ....... वैध जी ने एक लंबा और मोटा बयान जारी किया ...जो लोगो की समझ से परे था ...........पर लोग जान गये कि पागल ठीक नहीं हुये ..... राजा के दरबार में बैठक हुई जिसमे ........... जिसमे पागलो के इलाज पर चर्चा हुई .......... दूर देश से लोगो को बुलाया गया और उनसे अपने विचार व्यक्त करने को कहा गया ........  जब विचार मंथन से भी समस्या हल नहीं निकला तो  राजा ने इसे राष्ट्रिये आपदा घोषित करते हुये ...........इस आपदा से निपटने का का अपने जिम्मे कर लिया ............ और दूसरी ओर पागलो का पागलपन चरम पर था कुछ लोगो को वों ये समझाने में सफल हो चुके थे कि पागल होना ज्यादा अच्छा है लोग खुलकर तो सामने नहीं आ रहे थे फिर भी दबी दबी जुबान में पागलो का समर्थन कर रहे थे .........खैर राजा तो राजा था, वों समझता था जो दूर देश में हुआ है वों उसके देश में भी हो सकता है ...... जमानेवाले और पागल दोनों उसकी प्रजा है .....वों दोनों का राजा है .........वों प्रजा के साथ कुछ भी कर सकता है .........तो उसने निर्णय लिया कि एक पागल को मार दिया जाये .........दोनों साथ साथ पागल हुये थे ........तो राजा ने दोनों पागलो को अपने दरबार में बुलाया और उनसे पूछा तुम दोनों में से बड़ा पागल कौन है ........पागल ने राजा से पूछा क्यू ??...........राजा ने कहा में उसी की बात सुनूगा जो बड़ा पागल होगा .........भाई आपको अपना प्रतिनिधि चुनना ही होगा ......पागल सोच में पढ़ गये ........पहले पागल ने दूसरे पागल से कहा मैं बड़ा पागल हूँ और मैं प्रतिनिधित्त्व करुगा .......इस पर दूसरा बोला नहीं मैं बड़ा पागल हूँ और प्रतिनिधित्त्व मैं ही करुगा.......दोनों पागल आपस में लड़ने लगे .......कई दिनों तक लड़ाई चली ....कई महीनों तक लड़ाई चली .....कई सालो तक लड़ाई चली .....फिर एक दिन एक पागल ने हार मान ली और पागलो को उनका प्रतिनिधि मिल गया ..... फिर वों राजा के पास पहुचे..... राजा ने तत्काल ही प्रतिनिधि पागल को फांसी पर चढाने का फैसला सुना दिया ....... आनन फानन में एक पागल को फांसी पर चढा दिया गया ......अभी दूसरा पागल बहुत रोया .....बहुत दुःख हुआ उसे .......पर पागलो के दुःख से  किसी का क्या लेना देना ...... पर अचानक एक दिन उसने पागलपन बन्द कर दिया वों अचानक ही ठीक हो गया ........ जमानेवाले बड़े खुश हुये ....... उस दिन शहर में उत्सव मनाया गया ......सब कुछ पहले जैसा सामन्य हो गया ........ सब ने राजा की तारीफ़ की .....जो काम हनुमान जी और पीर बाबा नहीं कर सके और वैध जी भी काम नये आये .....वों काम राजा ने कर दिया ........ अब दूसरा पागल कभी कभी अपने दोस्त को याद कर पागलपन करता है ....... पर अकेले में ....कभी खुद को करंट लगाता है और कभी खुद को चांटे मारता है ..... उसे बड़ा अफ़सोस है कि उसका दोस्त पागलपन की भेट चढ गया ....... वो उन दिनों को याद कर अक्सर रोता है जब वों पागल था ..... जमानेवाले भी उन दिनों को याद करते है ....और राजा तो इतहास में अमर हो गया ..उसने अपने देश की एक बहुत बड़ी राष्ट्रीय समस्या को हल किया था ....कुछ दूसरे देशो ने भी राजा के इस कार्य की प्रशंसा की और अपने देश में भी यही उपाय किया पागलो से निपटने के लिये ....... कुछ सफल भी रहे ...... अभी तो इन पागलो की कानी का दौर थमा भी ना था और आज फिर से खबर आई है कि दो लोग फिर पागल हो गये है .....
अमितेष जैन

Friday, 12 October 2012

तीसरी गली का आखिरी मकान....



यहाँ, तीसरी गली में, जो आखिरी मकान है, वही जहाँ वो शायर रहता है, अरे दाड़ी वाला नहीं है वो जो अब मुछमुंडा हो गया है, पंहुचा दो जरा वहाँ, और चाचा के इतना कहते ही राजाराम चल पड़ा कोरियर वाले के साथ|
   अभी कोई एक आध साल हुआ होगा, एक पागल सा लड़का, जिसमे से सिगरेट की तीखी गंध आ रही थी आंटी के पास आया बोला, कमरा मिलेगा?
आंटी बोली,
है तो...
लड़का बोला, किराया ??
आंटी ने कहा, तेईस सौ रुपय, सौ रुपय पानी का अलग और बिजली का सात रुपय यूनिट, मीटर अगल है कमरे का, एक से ज्यादा ना रहना और सुनों जो करना है कमरे में ही करना, पड़ोसियों को समस्या नहीं होनी चाहिए नहीं तो कमरा खाली करा लूगीं, आग लगे इन पड़ोसियों में, कब से आएगा?
लड़का बोला, अभी से
आंटी ने लड़के को फिर से देखा,   सामान कहाँ है?
लड़के ने रिक्शे की ओर इशारा किया और सामान लाने चला गया|
ये औरत भी बड़ी दिलचस्प थी, पड़ोसियों से एक ना बनती थी इसकी, बी. ऐ. पास, दिन भर टी वी से चिपकी रहती, घर में बस पति, बच्चे नहीं थे, कोई कहता कि बाँझ है, कोई कहता पति पत्नी की लड़ाई में पेट में बच्चा मर गया, फिर माँ न बन सकी, बेचारी | बस चाचा से बतियाती थी, करीब सत्तर साल के चाचा सदियों से इस गली में रहते आये है जिसने देखा जब देखा राजाराम की दुकान पर, चाचा को गली, महोल्ले, शहर, देश की सभी कहानियाँ पता है, चाचा पर हर मर्ज की दवाई थी, कोई भी किस्सा आपके साथ हो वों चाचा के साथ हो चुका होता था, कहते है चाचा की बीबी किसी के साथ भाग गई थी सो चाचा पगला गये और तब से संत जैसा बर्ताब करने लगे, कोई ऐसा ना था जो चाचा से दुआ सलाम किये बिना  निकलता हो, सो आंटी भी बोलती थी चाचा से, राजाराम रोज चाचा के नाम की एक बंडल माचिस निकाल कर रख देता था, राजाराम की दुकान तब से यहाँ है जब से शायद चाचा संत हुये, दोनों बिना कहें ही एक दूसरे की बात समझ जाते, बस अंतर इतना था कि राजाराम घिस्सा खाता और चाचा पीते बीडी|
      आंटी ने सुबह सुबह देखा, अखबार पड़ा है दरबाजे पर, वों लड़का उठा रहा है जो कल ही आया है, आंटी ने पूछा, लड़के तुम ने चालू किया अखबार? लड़के ने हां में सर हिला दिया, आंटी मुस्कुराई, लड़का अपने कमरे में चला गया| दोपहर में डाकिया आया, दो खत लाया, आंटी ने बड़े आश्चर्य से पूछा, किसके है??
डाकिया बोला, पता तो आपका ही है आंटी, पर नाम है किसी विभोर राव खुशहाल का
आंटी बोली, ये खुशहाल क्या है रे
डाकिया बोला, किसी शायर बायर को कमरा दिया है क्या आपने?
आंटी सर खुजाते हुये बोली, क्या पता रे, अभी दिया तो है एक लड़के को कमरा, दिन भर सिगरेट पीता है, कमरे से बहार नहीं निकलता रुक पूछ के आती हूँ
ऐ तुम्हारा नाम विभोर है आंटी ने खिडकी की दरांच से झांक कर पूछा
हांलड़के ने कहा
ऐ लों तुम्हारी चिठ्ठी आई है रुखी सी आवाज में आंटी ने कहा
लड़के ने डाकिये से चिठ्ठी ली और कमरे में
 चला गया| अचानक आंटी की आवाज फिर से आई, लड़के तुम लिखते हो क्या?
लड़का बोला, हां
लड़के तुम क्या लिखते हो? आंटी ने फिर से पूछा 
कहानी, गाने, कविता सब लिखता हूँ लड़के ने कहा
ये खुशहाल क्या है? आंटी ने कमरे को गौर से देखते हुये पूछा
ये मेरा उपनाम है लड़के ने बोला
अच्छा,मैं भी बी. ऐ. तक पढ़ी हूँ आंटी ने कहा और मुस्कुरा दी  
लड़का भी मुस्कुराने लगा, आंटी खुश थी वों कब से चाहती थी उसके घर डाकिया आये, चिठ्ठी लाये, अखबार वाला आये, बचपन में उसके घर में आती थी चिठ्ठियां, पर बाबू जी पढ़ने ना देते थे, फिर ये मुए फोन आ गये, टुर्र टुर्र होते है, हलु हलु करते रहो बस| आंटी पहले से ज्यादा खुश थी, अब कभी किताबे आती तो कभी चिठ्ठी, आंटी लड़के को देने से पहले खुद पढ़ लेती, लड़के को कोई फर्क ना पड़ता था इस से, उसके कौन से जायजात के कागज आते थे, शुभकामनाएं बस, सो पढ़ ले आंटी, पेट तो भर नहीं जाएगा उनका, वों तो रोटी से ही भरेगा ना| अब आंटी ने टी वी देखना कम कर दिया था और अब वों कविताएँ गुनगुनाने लगी, पडोसने भी खुश रहने लगे थे आंटी से, अब आंटी थोड़ा ठीक से बात करती थी या यूँ कहें कम से कम बात तो करती ही थी|
ऐ लड़के, तुम अपना लिखा भी पढ़ने को दो कभीआंटी ने एक दिन सुबह सुबह कमरे में आकर लड़के से कहा, लड़के ने चुपचाप एक किताब लाकर दी|
दरबाजे का दर्द, लेखक विभोर राव खुशहाल, अच्छा नाम है लड़के, किताब का भी और तेरा भी आंटी किताब लेकर चली गयी|
आंटी दो दिन बाद फिर आयी ले रे तेरी किताब, अच्छा लिख लेता है रे तू आंटी ने लड़के को देखकर बोला, लड़का चुप रहा,
क्या हुआ आज उदास क्यू है रे? आंटी ने फिर पूछा
लड़का कुछ ना बोला| आंटी आज पहली बार कमरे में आकर लड़के की बगल में बैठ गई और धीरे से बोली, पैसे नहीं है ??
लड़के ने हां में सर हिलाया, कितना कमा लेता है रे ? आंटी ने फिर पूछा
लड़के ने धीरे से कहा, पाँच हजार
आंटी ने फिर कहा, बस, ये दिन भर आँखे फोड़ता है और बस पाँच हजार, तुझ से अच्छा तो राजाराम है बंडल माचिस से ही घर चला लेता है
लड़के को ताना अच्छा ना लगा, और उसने आंटी को गुस्से से देखा
ऐसे क्या देखता है रे, चल कोई बात नहीं एक काम कर मुझे हजार रुपय कम दे दिया कर और पानी के सौ रूपए भी मत दिया कर आंटी ने अधिकार से कहा
लड़का बोला, पर आंटी ....
आंटी ने बीच में टोक दिया, जब कमाने लगे तो ज्यादा दे देना, चल कोई दूसरी किताब दे लड़का मुस्कुराया और एक किताब और लाकर दी
कहानी की आवाज, लेखक रामदीन कलम, ऐ तुम सब लेखक पागल होते हो क्या? आंटी ने लड़के से पूछा, लड़का कुछ कहना चाहता था पर आंटी उठी और चली गई|
आज अचानक रात को दो बजे लड़के की नींद खुल गई, लड़ाई की आवाजें आ रही थी, आंटी जोर से अंकल को गालियाँ दे रही थी, अंकल, आंटी को मार रहे थे शायद, भद्दी भद्दी गालियों के साथ चीखने की आवाज, लड़का सो ना पाया, आंटी को देखने की इक्षा थी सो जल्दी ही सुबह, पानी मांगने पहुच गया|
आंटी एक बोतल पानी दे दीजिए लड़के ने दरबाजे के बहार से ही आवाज लगाईं
आंटी ने एक बोतल पानी लाकर दिया, लड़के ने देखा आंटी के ओंठ सूजे है और गालों पर उंगलीयो के निशान है, आंटी एक दर्द के साथ मुस्कुराई और बोली, कभी कभी तेरे अंकल ज्यादा पी लेते है, संभलती नहीं उनसे रे, आज जल्दी उठ गया रे तू |
बस ऐसे ही भूख लगी थी लड़के ने कहा
पराठे खायेगा?? आंटी बोली, लड़के ने हां में सर हिलाया, चल तू कमरे में जा, मैं चाय और पराठे बना के लाती हूँ लड़का चला गया|
आंटी चाय और पराठे लेकर आयी, दोनों साथ साथ खाने लगे, आंटी ने एक निबाला अपने हाथ से लड़के को खिलाया और अपनी आँखों से आसू पोंछते हुये बोली, कौन कौन है तेरे घर में?
लड़का बोला, माँ और बाबूजी, दीदी की शादी हो गई है|
कभी मिलाने नहीं आते न तू जाता है कभी आंटी ने पूछा
बाबूजी नाराज रहते है, मैं कमाता नहीं इसलिये, माँ को भी बात नहीं करने देते लड़के ने भारी आवाज में कहा
चल कोई बात नहीं लड़के सब ठीक हो जाएगा आंटी ने ये कहकर लड़के को गले से लगा लिया| अब जब भी आंटी कुछ खास पकवान बनाती लड़के को दे जाती|
उस दिन सुबह से ही लड़का सिगरेट पर सिगरेट पी रहा था, आंटी देख रही थी, ये सातवीं सिगरेट थी, आंटी ने लड़के से कहा लड़के ये सिगरेट के पैसे तेरे पास आ जाते है, वैसे भूखा डला रहता है
लड़के ने कहा, आंटी एक कहानी लिखनी है समझ नहीं आ रहा कहाँ से लिखू, क्या लिखू??
चाचा को पहचानता है? आंटी ने पूछा
हां लड़के ने कहा
उनसे बात किया कर, उस बुढ्ढे को सब पता है रे आंटी ने कहा
लड़का चाचा के पास आने जाने लगा, अभी तीन नई कहानियाँ लिखी है दो अखबार में आई है, अब चाचा बीडी की जगह सिगरेट पीते है, राजाराम लड़के का ब्रांड ले आया है|    
      कुछ महीने और निकल गये, एक दिन लड़का कहीं जा रहा था, आंटी ने पूछा, कहाँ जा रहा है रे लड़के?
आंटी इंटरव्यू है लड़के ने कहा
नौकरी करेगाआंटी ने पूछा
हाँ, पैसे नहीं है बिलकुल और मुझे भी तो अपना घर बनना है लड़के ने कहा
ठीक है जा आंटी ने मुस्कुराते हुये कहा
लड़का अब काम पर जाने लगा था, आंटी को किराया भी पूरा देता था, चाचा की सिगरेट बाकायदा चालू थी, राजाराम दो चार और ब्रांड ले आया था|
दो महीने बाद एक दिन शाम को फिर आंटी ने लड़के को रोका लिया अब अखबार नहीं मंगाता रे लड़के आंटी ने पूछा
नहीं आंटी, पढ़ने का समय नहीं मिलता लड़के ने कहा
अब किताबे भी आना कम हो गई है आंटी ने पूछा
हां आंटी, पढ़ने का समय नहीं मिलता लड़के ने कहा
खाना खायेगा रे, पराठे बनाये है आंटी ने फिर पूछा
नहीं आंटी, खा कर आया हूँ लड़के ने कहा
चल ठीक है रे लड़के आंटी ने उदासी से कहा, लड़का चला गया, आंटी ने आज बहुत दिनों के बाद टी.वी. चालू कर ली, दस मिनिट बाद बन्द कर दी|
तीन दिन बाद आंटी ने फिर आवाज दी लड़के, इस महीने के हिसाब में तुमने पाँच सौ रूपए ज्यादा दिए है
आपने ही तो कहा था आंटी, जब कमाने लगे तो दे देना, लड़के ने कहा
कितना कमाने लगा है रे, आंटी ने फिर पूछा
बीस हजार रुपया मिलते है, और आने जाने का अलग से, लड़का बोला
अच्छा है रे, अब तो बाबूजी खुश होंगे? आंटी ने पूछा
हां लड़के ने उदासी से कहा
तेरी अगली किताब कब आ रह है रे आंटी ने उत्साह से पूछा
आंटी अब किताब नहीं लिखूगां लड़के ने धीरे से कहा
क्यूँ रे आंटी ने आश्चर्य से पूछा
समय नहीं मिलता अब, और कौन सा रोटियाँ मिल जाती है लिखने से, और घर भी बनना है अपना लड़के ने खीझ कर उत्तर दिया, आंटी कुछ कहना चाहती थी, पर लड़का चला गया| आंटी ने फिर टी.वी. चालु की और आधे घंटे देखती रही|
            आज सुबह सुबह राजाराम ने आंटी को आवाज दी, और कहा आंटी कोई कोरियर वाला आया है, हमारे शायर साहब को पूछ रहा है
आंटी ने भड़क कर जवाब दिया, क्या शायर साहब शायर साहब लगा रखा है, उसका नाम है विभोर, यहाँ कोई शायर नहीं रहता, चल भाग यहाँ से
राजाराम चला आया, जब चाचा को राजाराम ने ये बात बताई तो चाचा ने कहा, ला रे राजाराम, बंडल निकाल, आज से अपनी सिगरेट बन्द और अब तू भी सिगरेट लाना बन्द कर दे राजाराम ने चाचा को बीडी दी और खुद के लिये घिस्सा बनाने लगा|
और वहाँ  आंटी ने कोरियर वाले से पूछा, क्या मंगाया है लड़के ने??      
कोरियर वाले ने कहा, मोबाइल है आंटी
इतना सुनते ही आंटी ने लड़के को बड़ी कर्कश आवाज दी, विभोर राव तुम्हारा कोरियर आया है
लड़के को आश्चर्य हुआ, आंटी आज नाम से बुला रही है, लड़का दौड़ कर आया, और आश्चर्य से बोला, क्या आंटी ??
आंटी ने खुद को काबू करते हुए बोला, विभोर राव तुम्हारा कोरियर है और आज शाम तक मकान खाली कर देना
इतना बोल कर आंटी चली गई, विभोर उन्हें विस्मित भाव से देखता रहा, आंटी ने अपने कमरे में जाकर तेज आवाज में टी. वी. चला ली|
लड़का जा चुका था, चाचा अब बीडी पीते है, राजाराम घिस्सा खाता है और आंटी ने मकान किराय से देना बन्द कर दिया है, अब उस तीसरी गली के आखिरी मकान से टी.वी के चलने की तेज आवाजे आती रहती है|
~©अमितेष जैन 

Saturday, 1 September 2012

कहानी : मुख्य विशाल दरबाजे के दाई ओर


क इमारत है, विशालकाय, दैत्यनुमा, काँच के कपड़े पहने, रंग चितकबरा हो गया है पर जँचता है| लोग आते है, रंगबिरंगे, सजीले, टाई पहने, कोट पहने, चमकीले, सजीले, जूते पहने| अरे जूते से याद आया इमारत के मुख्य विशाल दरबाजे के दाई ओर फेरन बैठता है, फेरन मोची, जाने कब से, शायद जब इमारत बनी तब से, ले आता है अपने मटमैले थैले में, दो चार पोलिस की डिबिया, ब्रुश, कुछ जूतों के सोल, दस बारह रंग के फीते, सिलने का धागा, सुजा और जाने क्या क्या| आते जाते लोग करा लेते है पोलिस, अपने जूतों पर, दो चार रुपया देकर, कई बार तो खुल्ले के चक्कर में फेरन फ्री में ही पोलिस कर देता, और अपने काले दांतों को भीचते हुये एक रुखी सी मुस्कान के साथ कहता बाबूजी आप तो आते ही रहते है फिर कभी दे जाइएगा, अब रुपया दो रुपया में कोई टाटा-बाटा तो हो नहीं जाताये बात अलग है कि किसी ने फिर कभी पैसे दिये ही नहीं| हाँ बाबूजी से याद आया इस इमारत में जो ऑफिस है उनमे इन बाबूजीयों का आना जाना लगा रहता है, बस से उतारे कपड़े ठीक किये, जूतों पर फेरन से पोलिस कराई और अंदर कौन कहाँ गया उस दरबाजे को पार कर, फेरन कभी न जान पाया, फेरन को तो ये भी न पता था कि ये बाबूजी अंदर जाकर किस किस को पोलिस करते थे, फेरन को ये पता होता कि उसके सामने दमंगी झाड़ने वाले ये बाबूजी अंदर जाकर भीगी बिल्ली बन जाते है और अपनी चिकनी चिपड़ी बातो से पोलिस करने का काम करते है तो शायद फेरन यूँ पैसे न छोड़ता और साल दो साल में पोलिस के दाम बड़ा भी देता|
                        आज सालो बाद इमारत का रंगरोगन हो रहा है, चितकबरा रंग और निखर आया है, खिड़कियों पर लगे काँचो की सफाई हुई है, पान तम्बाकू के धब्बों को हटाया है, सफाईवाले, माली, पार्किंगवाले और चपरासी को नये कपड़े मिले है| फेरन को चपरासी बता रहा था कि अब साहब का बड़ा लड़का ऑफिस का मालिक हो गया है, विलायत से पढ़ कर आया है, ये बड़ा समझदार है, साहब तो इसके आगे कुछ नहीं| फेरन ने सोचा चलो अच्छा हुआ, इस बहाने इमारत की सफाई तो हुई|
            अभी दो चार दिन ही हुये थे नये साहब को आये के फेरन देखता है नये साहब उसी की ओर चले आ रहे है, रोबदार है, गठीला बदन, एकदम वों फिल्मो का हीरों नहीं है अमिताभ, हाँ उस जैसे ही लगते है और ये कोट पैंट तो क्या जंचता है उन पर, टाई भी चमकीली, लगता है जूते पोलिस कराएगें, सब को कुछ न कुछ दिया है साहब ने, हम भी दस रुपया लेगें आज, अब विलायत में इतना तो देते ही होंगे पोलिस कराने का और चाटाक की आवाज के साथ फेरन का ख्वाब टूटा| देखते ही देखते भीड़ जमा हो गई, नये साहब जाने क्या बोले जा रहे थे, और फेरन अपने गाल पर हाथ रखे उन्हें आश्चर्य से देख रहा था| नये साहब चले गये, फेरन ने भी अपना डोरा-डंगर उठाया और चला गया| फिर इमारत के मुख्य विशाल दरबाजे के दाई ओर भी सफाई रहने लगी|
      चार दिन बाद चपरासी का फेरन से मिलना हुआ| चपरासी ने फेरन से कहा कि वों लौट क्यू नहीं आता, लौट आये| फेरन ने ये कह कर चपरासी को मना कर दिया कि उसे एक दूसरी जगह मिल गई है जहाँ कमाई तो ज्यादा नहीं पर वहाँ के साहब विलायत से पढ़ कर नहीं आये है और अब वों मुख्य विशाल दरबाजे के दाई ओर कभी नहीं आएगा|
      रही बात नये साहब कि तो, नये साहब आज कल बाबुजियों को बहुत डांटते है कहते है कि इन बाबुजियों को जूते पहनने की भी अक्ल नहीं, अरे कभी पोलिस भी करा लिया करो| दसियों बार तो साहब चपरासी से ही कह चुकें है की फेरन मिले तो उस से कहना, नये साहब उसके बारे पूछ रहे थे, वों फिर से मुख्य विशाल दरबाजे के दाई ओर बैठ सकता है|

Wednesday, 18 July 2012

लघुकथा : चोरी


एक शहर है, शहर क्या जनाब गाँव ही कहिये | एक अपंग अस्पताल, गड्डेदार सड़के, फ़ालतू घूमते युवा, अनपढ़ बच्चे, ठेकरा पहने लोग, आदि इत्यादि अनादि समस्याओं को समेटे हुये, सुना है आज उस उपेक्षित गाँव के ठेकेदार के महल का दरबाजा चोरी हो गया है और ये उस  गाँव के लोगो के  लिये सबसे  चिंतनीय विषय है| दरोगा जी ने तत्काल बैठक बुलाई है, ये तो छोटी सी समस्या है, जल्द ही हल हो जायेगी |

Monday, 16 July 2012

लघुकथा : आहार श्रंखला

वों गाँव के दूसरे छोर पर बैठा था| अभी अभी कुछ कुत्तों से उसने पीछा छुडाया था| घाव बहुत गहरे नहीं थे , शायद कुछ कुत्तों के पंजे लग गये थे, जलन हो रहे थे| सोच रहा था, क्यू उसने उस पक्षी को बचाया, वों कुत्तों का आहार था और भगवान ने भी तो यही तरीका बनाया है, एक आहार श्रंखला है एक व्यवस्था है| तभी पीछे से प्रहार हुआ और एक ही बार में उसके प्राण निकल गये| अगले दिन अखबारों में लोगो ने पढ़ा 'भाई ने भाई की जान ली|'
~~ ©अमितेष जैन

Saturday, 16 June 2012

लघुकथा : बडकौये


कुछ बडकौये खीझते हुये निकले, समोसो जलेबियो पर चोंच मारी, चाय की चुस्की ली, पंख खुजाए और काओं काओं की, फिर लोगो को दिखाया की काले है तो क्या हुआ दिल वाले है... लेकिन ये नहीं तय कर पाए कि हम सब में सबसे काला कौन है ............फिर एक को याद आया ..अबे सबसे काला तो मैं हूँ ........वों जोर से चिल्ल्या काओं .........पर तब तक सारे बडकौये अपने अपने घोसलों को लौट चुके थे ....अब कल देखें क्या होता है .............
~ ©अमितेष जैन 

Friday, 4 May 2012

कहानी : लव स्टोरी


शाम का समय था, ठन्डे जा रही थी और गर्मियाँ आने को थी, मौसम ज्यादा खुशगवार होता है इन दिनों, एक आजीब सी महक होती है चारो और बसंत की और ऐसे में मिल बैठे दो फुरसतिये तो शाम का मजा दुगना हो जाता है| ऐसा ही हुआ उस शाम, मिल गये दो गुरु चेले| एक गुरु जो अपने कर्मो का मारा था, पहले तो पढ़ाई की नहीं, फिर बाप के धंधे से नफरत और उस पर बुरी लत, वही सिगरेट-बीडी, गुटखा-पान| पर गुरु में थे गुरु वाले लक्षण, जबानी का तजुर्बा, बाप की फटकार, और किस्मत की मार| और एक चेला, अभी नये नये खिले थे ये भी और ठलुओ के पार्टी के ब्रांड न्यू सदस्य थे, उस पर किस्मत का कहर गुरु मिले तो भी यही, कॉलेज से छुट कर करके बाप की फटकार से बचने आते थे अड्डे पर, कश लेना तो बहाना था और यहीं प्रथम मिलन हुआ गुरु-चेले का, और धीरे धीरे मित्रता गहराती रही| वैसे कहानी तो ये पड़ोस की ही लगती है, है ना| तो दोनों साले ठलुआ को काम धाम कुछ नहीं, कश पे कश और फिजूल की बहस| अक्सर कस्वो में मिल जायेगें आपको ऐसे आवारा, जिन्हें दुनियां प्यार से “निठल्ला है बेचारा” कहती है, और गुस्से में “चुप वे ठलुऐ”|
अब पाठक सोचे में होंगे, के जनाब लेखक महोदय आप में न तो अक्ल है और न समझ, क्यू मौसम की बैंड बजाने पर तुले हुये हों यार, वसंत का मजा क्यों खराब कर रहे हों, अरे ये तो वों का वक्त है, जब मिलते है दो जबां दिल और बनती है प्यार की कहानियाँ, और एक आप है दिल-बिल तो गया तेल लेने, मिला दिया ठलुओं को, अब चरेंगे एक दूसरे का दिमाग और करेगें हमारा वक्त बरबाद| तो मित्रों मैं आपको एक बात बताता हूँ, कभी कभी इन निठल्लों की बकबास में बड़ी गहरी बात होती है| खैर छोडिये, हम आते है ठलुआ मिलन पर|
तो साहब दोनों ठलुए यू तो अक्सर मिलते रहते थे, पर आज तो कुछ खास था| एक तो वसंत उस पर ठंडी पवन, और उस पर चेले के मन में मचलते प्रश्न, फिर अड्डे पर सन्नाटा और उठने लगा ज्वार भाटा| तो चेले ने भूमिका बनाते हुये गुरु से कहा, “गुरुदेव, यार आज कल दिल नहीं लगता और बाप भी कुछ ज्यादा फटकारने लगा है|”
गुरु बोला,” अवे साले एक बात बाताओ तुम, ये बाप का फटकारना तो समझ आता है पर तुम्हारे दिल का न लगना समझ नहीं आता, अवे दिल ना हुआ साले ढक्कन हों गया, लग नहीं रहा??”
चेला बोला,” नहीं यार गुरु सच्ची, जब से वों शर्मा की लड़की को देखा है, तब से साला ना नींद आती है, न चैन, गुरु बस अजीब सा लगता है, लगता है साला शर्मा की लड़की हों और हम हों, बस बैठे और बतियाए|”
गुरु बोला,”बेटा हमें लग रहा है, तुम साले फस रहे हों प्यार-व्यार के चक्कर में, अवे मत जाओ साले, थोड़े बहुत काम के बचे हों, काम से चले जाओगे|
चेला बोला, “ अच्छा गुरु एक बात बताओ, जे प्यार आखिर होता क्या है??”
गुरु ने अपनी जेब से एक सिगरेट निकाली, जलाई और कश लेते हुये बोला, “बेटे प्यार कुछ नहीं होता, साले सब आदमी को निठल्ले बनाने के धंधे है, तुम न पड़ना इन चक्करों में, सुनों भुत-प्रेत, विघ्न-बांधा का इलाज है, ये प्यार का कोई इलाज नहीं है|
हेऐ गुरु, चेला शरमाते हुये बोला, “ ऐसा थोड़े होता है, कुछ तो इलाज होगा, वों शर्मा की लड़की आ जाये तो भी ना क्या इलाज होगा??”
गुरु फिर बोला,” सुन वे, लड़की आये चाहे ना आये, साले मरोगे तुम ही, अवे चाहे कद्दू गिरे छुरी पर चाहे छुरी कद्दू पर साले कटना तो कद्दू को ही है, साले हमें गुरु कहते हों, तो हमारे तजुर्बे से भी काम लिया करों, मान लिया करो बात को, अभी संभल गये तो ठीक, नहीं तो जिन्दगी भर भुगतना पढ़ेगा|
चेला बोला,” अच्छा गुरु सच बताना तुम्हे प्यार हुआ है कभी??”
गुरु चिल्लाया,” अबे मना कर रहे है तुमसे और तुम बके जा रहे हो, सिगरेट पियो और खिसको, तुम्हारे बाप को पता चला तो तुम्हे तो मारेगा ही, हमें भी गालियाँ देगा, और तुम्हारी कोई वेल्यु हों या न हों, हमें सब जानते है|”
चेला बोला,” ठीक है गुरु, तुम कहते हों मान लेता हूँ, लाओ सिगरेट दो|”
चेले ने सिगरेट ली और चुप हों गया| देर तक एक खामोशी रही अड्डे पर| फिर गुरु बोला,” अबे चेले एक बात बात बता, साले क्या होता है तुम्हे आजकल, मतलब फीलिंग कैसी होती है ???”
चेला चौका, “गुरु अभी तो तुम मना कर रहे थे, और अब तुम पूछ रहे हों, गुरु क्या चक्कर है ??”
गुरु बोला,”चल जाने दे यार ऐसे ही पूछ लिया”
चेला बोला,” गुरु बस ऐसे ही या कोई बात है, सच बताओ गुरु, तुम्हारी कसम किसी से नहीं कहुगा|”
गुरु बोला, “ यार हम देख रहे थे, तुम्हे भी वैसा ही होता है, जैसा हमें होता था?”
चेला बोला, “ गुरु तुम्हे भी होता था, मतलब तुम्हे भी प्यार था??”
गुरु बोला, “ हां था तो रे”
चेला बोला,” कौन थी गुरु, तुम तो छुपे निकले??”
गुरु बोला,” थी यार एक, अपने डाक्टर साब है न, उनके बगल में रहती थी, सनोबर नाम था उसका”
चेला बोला,” वाह गुरु, आप भी खेले खाए है, तो गुरु सुनायेगे नहीं सनोबर का किस्सा??”
गुरु बोला,” सुनायेगे क्यू नहीं यार, पर सुनने के लिये दिल होना चाहिये”
चेला बोला,”मतलब गुरु हमारे पास दिल ही नहीं, अरे आप सुनाइये तो, साला हम से बड़ा दिल है किसी का??”
गुरु बोला,” तो सुनों भाई, लेकिन शर्त ये है, की सुनने के बाद दिल में दफन कर लेना, नहीं साले हम से बुरा कोई न होगा, समझे?”
चेला बोला,” हां गुरु, अरे हमें भी इस शहर में रहना है, इधर सुना और उधर भूल गये|”
गुरु बोला,” तो सुनों..” और गुरु देव खो गये पुराने यादों में फिर बोले, “ बात उन दिनों की है जब हम ११वी पढ़ते थे, यही दिन चल रहे थे, वसंती, चारो और एक महक, फिर डाक्टर साहब के बगल में रहने आये, मेनेजर साहब, बैक में थे, दो लड़किया थी उनकी, एक हमारे साथ पढ़ती थी, नाम था सनोबर|”
चेला बोला, “फिर गुरु??”
गुरु बोला, “ अव्बे चुपचाप सुनों बस, हां तो नाम था सनोबर, तो हमने जब सनोबर को देखा, तो वों हमें कुछ खास लगी, बस दिल में घर कर गई, सोचा ...लड़की हों जिन्दगी में तो सनोबर जैसी, न कोई रंग रोगन, न कोई लाग लपेट, बस कुदरत की नयाब चीज| फिर सोचा के भाई लड़की तो देख ली अब इसे पटाया कैसे जाये|”
चेला बोला,” हेएन”
गुरु ने इस बार टोका नहीं, गुरु बोला,”हां, फिर हमने कर दिये आशिको वाले चोचले चालु, सनोबर जिधर हम उधर और उन दिनों हमारे पास साइकल हुआ करती थी, तो उठाई साइकल और निकल लिये, दो बढ़िया ब्रांड की बुशर्ट और दो जीन्स बस यही पहनते थे उन दिनों| क्या स्कूल और क्या कोचिगं सब जगह जलजला भाई का|
चेला अपनी उत्सुकता बढाते हुये बोला फिर गुरु बोला,”वाह गुरु, फिर ??”
गुरु ने कहना चालु रखा,” फिर हुआ ये, के एक दिन सनोबर ने हमें देखा, पहली नज़र पड़ी थी उसकी हम पर, भाई वों दिन तो हम तुम्हे बता ही नहीं सकते, बिजलियाँ गिरी बिजलियाँ, अंदर तक हिल गये, हालत तो ये थी की अब गये की तब गये|”
चेला उचका,” अच्छा फिर गुरु|”
गुरु बोला,” फिर तो मर ही गये, उसने मुस्कुरा दिया”
चेला बोला,”ओ तेरे की”
गुरु बोला,” हां रे, बस वों था आखरी दिन, हमारे काम के होने का, वों उधर मुस्कुराई और हम यहाँ खत्म, फिर दो चार दिन बाद दिया एक पत्र, इत्र में लपेट के लाल कागज पर, उसने पढ़ा भी हमारे समाने और फाड़ भी दिया और चली गई भुनभुना के, अब क्या बताए, हम तो डर गये, कहीं बाप से कह दे, उसका बाप तो मारेगा ही, हमारा बाप मरेगा भी और घसीटेगा भी, लेकिन कहा किसी से नहीं|
चेला बोला,”फिर गुरु”
गुरु बोला,”फिर क्या वे, बस अपना ढर्रा जो चल रहा था चलता रहा| फिर एक दिन मिल गई, स्कूल के पास, कोई नहीं था हम और वों, मौसम सुहाना था, हमने भी पकड़ लिया हाथ और बोल दिया “
चेला बोला,” क्या बोला गुरु ??“
गुरु सीना चौड़ा करते हुये बोला,” हमने कहा, सुनों यदि हमारी बात का जबाव नहीं दिया तो हम मर जायेगे|”        
चेला बोला,” फिर गुरु “
गुरु बोला, ‘ फिर वों कुछ न बोली, बस खड़ी रही, हमने हाथ छोड़ दिया, फिर धीरे से पूछा, क्या हुआ??, तो झील से दो मोती टपक गये, रों डी यार वों|”
चेला बोला,” मगर क्यों गुरु??”
गुरु बोला, “हमें पूछा क्या हुआ रों क्यू रही हों, बुरा लगा, माफ कर दो, हम सवाल पूछते रहे, वों न में सिर हिलाती रही और रोती रही, फिर हम से  न रहा गया, हमने कहा या तो तुम बता दो नहीं तो आज ही जान देदेगे हम अपनी|”
चेला बोला,” फिर गुरु”
गुरु बोला,” फिर वों बोली”
चेला बोला,” क्या बोली??”
गुरु बोला, “ वों बोली, वीर सिह, समझों हम मुसलमान है और आप हिंदू, हमारे अव्बू कभी नहीं मानेगे, हम कभी साथ नहीं रह पायेगें|”
चेला बोला,” फिर गुरु”
गुरु बोला, “ फिर हमने पूछा, तो तुम हमसे प्यार नहीं करती??”
चेला बोला,”तब “
गुरु  बोला,” बोली, प्यार तो हम आपसे ही करते है और करते रहेगें, पर यदि आपको हमसे प्यार है तो आप हमसे फिर कभी बात न कीजिएगा|”
चेला बोला,” तब तुमने क्या किया गुरु”
गुरु बोला,” नहीं की बात, हम प्यार करते है उसे”
चेला बोला,” गुरु बात तो करनी थी, शायद मान जाती??”
गुरु बोला. “नहीं रे बात तो उसकी भी सही थी, हम हिंदू और वों मुसलमान, बाप तो हमारा भी नहीं मानता|”
चेला बोला,” गुरु बात तो सही है तुम्हारी, ये धर्म-जात बनाई किसने, साले का मुह तोड़ देते है, न रहेगा बांस और न बजेगी बांसुरी|”
गुरु बोला,” हां यार,उसे तो आधी दुनियाँ के आशिक ढूंड रहे है|”
चेला बोला, “ गुरु कितनी अजीब बात है न, धर्म, मजहब, जात सब को जोड़ने के लिये बनाई, और इन्ही चीजों ने सब को बाँट के रख दिया|”
गुरु  बोला, “ हां यार, लेकिन अव क्या किया जाये, सब को कौन समझाए??”
चेला बोला, “ जाने दो यार गुरु, जो हों गया तो हों गया, तुम सिगरेट पियों....लों “
गुरु ने सिगरेट के दो कश लिये और जाने लगा|  
चेला बोला, “ गुरु जाते जाते एक बात और बताते जाओ, हम ये साला प्यार करें की नहीं?????”
गुरु बोला,” कर लों वे”
चेला चौका,” गुरु क्या कह रहे हों कर लों???”
गुरु बोला,” हां कर लों वे, यही तो एक चीज है जो हमेशा साथ रहती है”
और गुरु चला गया ..................
~ ©अमितेष जैन                

व्यंग : फुन्तुरु बाबा का शंका समाधान


(फुन्तुरु बाबा का दरबार लगा है, बाबा अपने लेपटोप पर तन्मयता से फेसबुक पर कुछ कुछ कर रहे है| गले में हेडफोन शोभायमान है, टकर टकर की मधुर ध्वनि गुंजायमान है| इतने में चेला प्रमुख पाखंड और अन्य चलों का लोंग इन (प्रवेश) होता है|
चेला प्रमुख पाखंड : फुन्तुरु बाबा की फुर्र हो .......
बाँकी चेले (एक साथ) : फुर्र फुन्तुरु बाबा...फुर्र फुर्ररर
फुन्तुरु बाबा : बैठो, क्या प्रश्न लाये हो बालक?
चेला गुड गोबर दास, चोला लाल और उज्जवल कल्लू  : ३ लाइक, १ शेयर
(सभी चेले बैठते हुये)    
चेला प्रमुख पाखंड : बाबा प्रश्न-मश्न तो कोई नहीं |
बाँकी चेले (एक साथ) : कोई नहीं, कोई नहीं बाबा
फुन्तुरु बाबा : फिर क्यू आये हो?
चेला घोंचू सिह, खुल्लखुल्ल प्रसाद : २ लाइक
चेला प्रमुख पाखंड : बाबा एक बात-मात कहनी थी ...
बाँकी चेले(एक साथ) : कहनी थी, कहनी थी बाबा
फुन्तुरु बाबा : कहो
चेला कीड़ाकान्त : १ लाइक, १ शेयर
चेला प्रमुख पाखंड : बाबा अपने मार्केट-शार्केट में एक नया ब्रांड-श्रांड बड़ी धूम मचा रहा है ...
बाँकी चेले(एक साथ) :नया ब्रांड-श्रांड, नया ब्रांड-श्रांड बाबा
फुन्तुरु बाबा : नया ब्रांड! कौन सा बच्चा
चेला चिल्लपों, काएं मल, छिछोरी छुरी : ३ लाइक, २ शेयर
चेला प्रमुख पाखंड : बाबा कोई निर्मल-उर्मल है
बाँकी चेले(एक साथ) : निर्मल-उर्मल, निर्मल-उर्मल बाबा
फुन्तुरु बाबा(एक कातिलाना मुस्कान के साथ) : अच्छा, तो तुम क्यू चिंतित हो ??
चेला छीनेटी, कुप्पा, वक्र बाती, चालू भोला : ४ लाइक, २ शेयर   
चेला प्रमुख पाखंड (चिंतित स्वर में) : बाबा अपनी तो वाट-साट लग रही है, लोग आज-कल चंदा-बंदा नहीं देते
बाँकी चेले(एक साथ) : चंदा-बंदा, चंदा-बंदा बाबा
फुन्तुरु बाबा : हूऊऊउ.....
चेला तुच्यासुर, सर्वस्वार्थी, विवेकामंद : ३ लाइक
चेला प्रमुख पाखंड : बाबा सुना है वों २००० हजार तो बस दर्शन-फर्शण के ही ले लेता है..........और टी.व्ही.-ऊ.व्ही पर अलग आता है.......वों रामदेव बाबा भी पिछड़-उछड रहे है उससे.......और दो चार बाबा तो सब त्याग व्याग कर ......सच के सन्यासी-चन्यासी  हो गये है और सुनने सुनाने में तो ये भी आया है .....के वों खुद ही जूनियर-फुनियर कलाकार लाकर, उनसे प्रश्न-मश्न पुछवाता है.....और टी.आर.पी बड़ाता है ........दो चार नेता-पेता बरगला ले तो कोई बड़ी बात नहीं .......और तो करोडोँ तो रोज खाते-जाते में जमा होते है ........अभी तो हमारी शुरुवात ही है प्रभु .....ऐसा ही चला तो कैसे काम-शाम चलेगा ........
चेला चेंट चुपिकू : १ लाइक
बाँकी चेले : काम-शाम, काम-शाम बाबा ....
फुन्तुरु बाबा (कुछ सोच कर, एक दार्शनिक अंदाज में) : बेटा तुम चिंता मत करो, कोई बाबा किसी बाबा का दुश्मन नहीं होता, सब एक दूजे को रास्ता देते है, और तुम इस देश की मानसिकता को समझों, यहाँ बाबाओ को फोलो करना फैशन है, कल कोई और था आज कोई और है और कल हम होंगे| जैसे पहले धोती कुर्ते का फैशन था, फिर कुर्ता पजामा आया, फिर पतलून बुस्सेट का, फिर जीन्स टी-शर्ट का, फिर केप्री टी-शर्ट का और अब चड्डा-बनियान का ऐसे ही बाबाओ के दौर भी आते है| और निर्मल बाबा कुछ गलत नहीं करते जो कलाकारों को पैसे देकर प्रश्न पूछते है, अरे हम क्या झूटे लाइक नहीं बटोरते, क्या नेता नोट देकर वोट नहीं लेते और इसके लिये सबसे ज्यादा तो मीडिया जिम्मेदार है, पैसा लेकर न्यूज बनाते भी है और दवाते भी है| निर्मल बाबा तो बेचारे है जो चैनल उनके विज्ञापन दिखाता है, बही न्यूज में धज्जियाँ उडाता है, और न्यूज चैनल बालो को भी दोष देना ठीक नहीं, साली टी.आर.पी है ही इतनी कुतिया चीज| अब सवाल रहा नेता का तो बेटा जो नेता अपनी पार्टी का नहीं होता वों क्या किसी बाबा का होगा| बेटा बाबागिरी में तो अब भी पैंदी है, पर नेतागिरी की लुटिया की पैंदी कब की घिस गई | बेटा एक एक बाबा सौ सौ नेताओं को पाल सकता है, उदाहरण तुम्हारे सामने है, सोना फोन, इस्कुल-फिल्कूल, अस्पताल-आडम्बर क्या क्या नहीं किया बाबाओं ने और शुरुवात में ही डर जाओगें तो कैसे काम चलेगा, और ये निर्मल से डरने की तो वैसे भी जरुरत नहीं न तो कोई न तो कोई ट्रस्ट है न कोई कथित समाजसुधारक गतिविधि, इस सब चीजों से सबक लों और काम पर लगों|
चेला प्रमुख पाखंड, चेंट चुपिकू, गुड गोबर दास, चोला लाल, उज्जवल कल्लू, घोंचू सिह, खुल्लखुल्ल प्रसाद, कीड़ाकान्त, चिल्लपों, काएं मल, छिछोरी छुरी, छीनेटी, कुप्पा, वक्र बाती, चालू भोला, तुच्यासुर, सर्वस्वार्थी, विवेकामंद, चेंट चुपिकू : २० लाइक, १५ शेयर
चेला प्रमुख पाखंड: बाबा मगर वों चंदे-बंदे वाली बात-सात तो रह ही गई
बाँकी चेले(एक साथ): बात-सात, बात-सात बाबा
फुन्तुरु बाबा: अरे कहाँ ना हर कुत्ते के दिन आते है, हमारे भी आयेगे, अब चलो, फेसबुक पर अन्य शिष्य भी इतजार में है ...
प्रमुख पाखंड, चेंट चुपिकू, गुड गोबर दास, चोला लाल, उज्जवल कल्लू, घोंचू सिह, खुल्लखुल्ल प्रसाद, कीड़ाकान्त, चिल्लपों, काएं मल, छिछोरी छुरी, छीनेटी, कुप्पा, वक्र बाती, चालू भोला : ९ लाइक, ५ शेयर 
सभी चेले (जाते हुये यानि लोंग आउट करते हुये) : फुर्र फुन्तुरु बाबा...फुर्र फुर्ररर, फुर्र फुन्तुरु बाबा...फुर्र फुर्ररर
फुन्तुरु बाबा : १ लाइक, १ शेयर
~ ©अमितेष जैन