एक शहर है, शहर क्या जनाब गाँव ही कहिये | एक अपंग अस्पताल, गड्डेदार सड़के, फ़ालतू घूमते युवा, अनपढ़ बच्चे, ठेकरा पहने लोग, आदि इत्यादि अनादि समस्याओं को समेटे हुये, सुना है आज उस उपेक्षित गाँव के ठेकेदार के महल का दरबाजा चोरी हो गया है और ये उस गाँव के लोगो के लिये सबसे चिंतनीय विषय है| दरोगा जी ने तत्काल बैठक बुलाई है, ये तो छोटी सी समस्या है, जल्द ही हल हो जायेगी |
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Wednesday, 18 July 2012
Monday, 16 July 2012
लघुकथा : आहार श्रंखला
वों गाँव के दूसरे छोर पर बैठा था| अभी अभी कुछ कुत्तों से उसने पीछा छुडाया था| घाव बहुत गहरे नहीं थे , शायद कुछ कुत्तों के पंजे लग गये थे, जलन हो रहे थे| सोच रहा था, क्यू उसने उस पक्षी को बचाया, वों कुत्तों का आहार था और भगवान ने भी तो यही तरीका बनाया है, एक आहार श्रंखला है एक व्यवस्था है| तभी पीछे से प्रहार हुआ और एक ही बार में उसके प्राण निकल गये| अगले दिन अखबारों में लोगो ने पढ़ा 'भाई ने भाई की जान ली|'
~~ ©अमितेष जैन
Friday, 4 May 2012
लघुकथा : घटिया
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