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Friday, 4 May 2012

व्यंग : फुन्तुरु बाबा का शंका समाधान


(फुन्तुरु बाबा का दरबार लगा है, बाबा अपने लेपटोप पर तन्मयता से फेसबुक पर कुछ कुछ कर रहे है| गले में हेडफोन शोभायमान है, टकर टकर की मधुर ध्वनि गुंजायमान है| इतने में चेला प्रमुख पाखंड और अन्य चलों का लोंग इन (प्रवेश) होता है|
चेला प्रमुख पाखंड : फुन्तुरु बाबा की फुर्र हो .......
बाँकी चेले (एक साथ) : फुर्र फुन्तुरु बाबा...फुर्र फुर्ररर
फुन्तुरु बाबा : बैठो, क्या प्रश्न लाये हो बालक?
चेला गुड गोबर दास, चोला लाल और उज्जवल कल्लू  : ३ लाइक, १ शेयर
(सभी चेले बैठते हुये)    
चेला प्रमुख पाखंड : बाबा प्रश्न-मश्न तो कोई नहीं |
बाँकी चेले (एक साथ) : कोई नहीं, कोई नहीं बाबा
फुन्तुरु बाबा : फिर क्यू आये हो?
चेला घोंचू सिह, खुल्लखुल्ल प्रसाद : २ लाइक
चेला प्रमुख पाखंड : बाबा एक बात-मात कहनी थी ...
बाँकी चेले(एक साथ) : कहनी थी, कहनी थी बाबा
फुन्तुरु बाबा : कहो
चेला कीड़ाकान्त : १ लाइक, १ शेयर
चेला प्रमुख पाखंड : बाबा अपने मार्केट-शार्केट में एक नया ब्रांड-श्रांड बड़ी धूम मचा रहा है ...
बाँकी चेले(एक साथ) :नया ब्रांड-श्रांड, नया ब्रांड-श्रांड बाबा
फुन्तुरु बाबा : नया ब्रांड! कौन सा बच्चा
चेला चिल्लपों, काएं मल, छिछोरी छुरी : ३ लाइक, २ शेयर
चेला प्रमुख पाखंड : बाबा कोई निर्मल-उर्मल है
बाँकी चेले(एक साथ) : निर्मल-उर्मल, निर्मल-उर्मल बाबा
फुन्तुरु बाबा(एक कातिलाना मुस्कान के साथ) : अच्छा, तो तुम क्यू चिंतित हो ??
चेला छीनेटी, कुप्पा, वक्र बाती, चालू भोला : ४ लाइक, २ शेयर   
चेला प्रमुख पाखंड (चिंतित स्वर में) : बाबा अपनी तो वाट-साट लग रही है, लोग आज-कल चंदा-बंदा नहीं देते
बाँकी चेले(एक साथ) : चंदा-बंदा, चंदा-बंदा बाबा
फुन्तुरु बाबा : हूऊऊउ.....
चेला तुच्यासुर, सर्वस्वार्थी, विवेकामंद : ३ लाइक
चेला प्रमुख पाखंड : बाबा सुना है वों २००० हजार तो बस दर्शन-फर्शण के ही ले लेता है..........और टी.व्ही.-ऊ.व्ही पर अलग आता है.......वों रामदेव बाबा भी पिछड़-उछड रहे है उससे.......और दो चार बाबा तो सब त्याग व्याग कर ......सच के सन्यासी-चन्यासी  हो गये है और सुनने सुनाने में तो ये भी आया है .....के वों खुद ही जूनियर-फुनियर कलाकार लाकर, उनसे प्रश्न-मश्न पुछवाता है.....और टी.आर.पी बड़ाता है ........दो चार नेता-पेता बरगला ले तो कोई बड़ी बात नहीं .......और तो करोडोँ तो रोज खाते-जाते में जमा होते है ........अभी तो हमारी शुरुवात ही है प्रभु .....ऐसा ही चला तो कैसे काम-शाम चलेगा ........
चेला चेंट चुपिकू : १ लाइक
बाँकी चेले : काम-शाम, काम-शाम बाबा ....
फुन्तुरु बाबा (कुछ सोच कर, एक दार्शनिक अंदाज में) : बेटा तुम चिंता मत करो, कोई बाबा किसी बाबा का दुश्मन नहीं होता, सब एक दूजे को रास्ता देते है, और तुम इस देश की मानसिकता को समझों, यहाँ बाबाओ को फोलो करना फैशन है, कल कोई और था आज कोई और है और कल हम होंगे| जैसे पहले धोती कुर्ते का फैशन था, फिर कुर्ता पजामा आया, फिर पतलून बुस्सेट का, फिर जीन्स टी-शर्ट का, फिर केप्री टी-शर्ट का और अब चड्डा-बनियान का ऐसे ही बाबाओ के दौर भी आते है| और निर्मल बाबा कुछ गलत नहीं करते जो कलाकारों को पैसे देकर प्रश्न पूछते है, अरे हम क्या झूटे लाइक नहीं बटोरते, क्या नेता नोट देकर वोट नहीं लेते और इसके लिये सबसे ज्यादा तो मीडिया जिम्मेदार है, पैसा लेकर न्यूज बनाते भी है और दवाते भी है| निर्मल बाबा तो बेचारे है जो चैनल उनके विज्ञापन दिखाता है, बही न्यूज में धज्जियाँ उडाता है, और न्यूज चैनल बालो को भी दोष देना ठीक नहीं, साली टी.आर.पी है ही इतनी कुतिया चीज| अब सवाल रहा नेता का तो बेटा जो नेता अपनी पार्टी का नहीं होता वों क्या किसी बाबा का होगा| बेटा बाबागिरी में तो अब भी पैंदी है, पर नेतागिरी की लुटिया की पैंदी कब की घिस गई | बेटा एक एक बाबा सौ सौ नेताओं को पाल सकता है, उदाहरण तुम्हारे सामने है, सोना फोन, इस्कुल-फिल्कूल, अस्पताल-आडम्बर क्या क्या नहीं किया बाबाओं ने और शुरुवात में ही डर जाओगें तो कैसे काम चलेगा, और ये निर्मल से डरने की तो वैसे भी जरुरत नहीं न तो कोई न तो कोई ट्रस्ट है न कोई कथित समाजसुधारक गतिविधि, इस सब चीजों से सबक लों और काम पर लगों|
चेला प्रमुख पाखंड, चेंट चुपिकू, गुड गोबर दास, चोला लाल, उज्जवल कल्लू, घोंचू सिह, खुल्लखुल्ल प्रसाद, कीड़ाकान्त, चिल्लपों, काएं मल, छिछोरी छुरी, छीनेटी, कुप्पा, वक्र बाती, चालू भोला, तुच्यासुर, सर्वस्वार्थी, विवेकामंद, चेंट चुपिकू : २० लाइक, १५ शेयर
चेला प्रमुख पाखंड: बाबा मगर वों चंदे-बंदे वाली बात-सात तो रह ही गई
बाँकी चेले(एक साथ): बात-सात, बात-सात बाबा
फुन्तुरु बाबा: अरे कहाँ ना हर कुत्ते के दिन आते है, हमारे भी आयेगे, अब चलो, फेसबुक पर अन्य शिष्य भी इतजार में है ...
प्रमुख पाखंड, चेंट चुपिकू, गुड गोबर दास, चोला लाल, उज्जवल कल्लू, घोंचू सिह, खुल्लखुल्ल प्रसाद, कीड़ाकान्त, चिल्लपों, काएं मल, छिछोरी छुरी, छीनेटी, कुप्पा, वक्र बाती, चालू भोला : ९ लाइक, ५ शेयर 
सभी चेले (जाते हुये यानि लोंग आउट करते हुये) : फुर्र फुन्तुरु बाबा...फुर्र फुर्ररर, फुर्र फुन्तुरु बाबा...फुर्र फुर्ररर
फुन्तुरु बाबा : १ लाइक, १ शेयर
~ ©अमितेष जैन 

व्यंग : ग्राम फेसबुक में महात्मा फुन्तुरु


ग्राम फेसबुक में एक महात्मा है महात्मा फुन्तुरु| महात्मा फुन्तुरु के ५००० हजार मित्र और ३००० के करीब अभिदाता (subscriber) है| महात्मा फुन्तुरु जो दीवार पर लिख दें वो पत्थर की लकीर , किसी की क्या हिमाकत जो महात्मा फुन्तुरु की बात का विरोध करें (हां ते बात और थी की विचार उनके अपने न होते थे वे बस अपने वरिष्ठों के विचारों का बखान करते थे ...अब इसके लिये वें आपना नाम साथ में लिख देते थे ...बस यही कीमत थी विचारों के बखान की ) और ऐसा होने पर उनके मित्र, शिष्य, सहियोगी जो खैर ख़बर लेते थे कि बन्दा फेसबुक ग्राम में निकलने से डरने लगता था| बात एक दिन कि है जब महात्मा फुन्तुरु ने अपनी दीवार पर लिखा 'मूर्खो से तर्क न करों, वें पहले अपने तर्कों से अपनी बराबरी पर लाते है, फिर उन्ही कुतर्कों से आपको परास्त करते है|', बस फिर क्या था वाह वाह, सहमत हूँ, सही कह रहे है आप आदि टिप्पणीयों की बौछार चालु अभी ५०-५५ टिप्पणियाँ ही हो पाई थी कि किसी मुर्ख ने लिख दिया ' ऐसी बाते बस बही लोग करते है जो दूसरों को समझाने में सक्षम नहीं होतें|' और महात्मा फुन्तुरु को ज्ञान प्राप्त हो गया उन्होंने तुरंत ही अपना लिखा हटा दिया | दोस्तों कहानी यहीं खत्म नहीं होती, अगले दिन महात्मा फुन्तुरु की दीवार पर लिखा था 'आप मूर्खो से भी बहुत कुछ सीख सकते है|'

महात्मा फुन्तुरु की एक आदत सबसे निराली है वें केवल उन्ही को मित्र बनाते है जो उनकी हाँ में हाँ मिलाते है| उनकी दीवार पर वाह-वाही करते है और उनके दीवार पर लिखा प्रचरित करते है| पर आप गेहूँ पिसवाने जाओ तो घुन आ ही जाता है इसी तरह ग्राम फेसबुक में कौन गेहूं है और कौन घुन आप नहीं जान सकते| तो महात्मा फुन्तुरु की दोस्त सूची में कुछ धुन चिपक गया| जब बार बार प्रयत्न करनें के बाद भी महात्मा फुन्तुरु किसी घुन को गेहूँ बनाने ने असफल होते तो वों उस पर ब्रह्म अस्त्र का प्रोयोग करते| वें बस घुन को एक सन्देश भेजते| संदेश कुछ ऐसा होता 'प्रिय घुन , आप ऎक अच्छे कलाकार है , मै अपनी दीवार पर कई संगीतकारो , लेखको ,शायरो ऐंव कलाकारों से जुडा हुआ हूं । मैने आपकी टिप्पणी अपनी दीवार पर आपको पुरा सम्मान देते हुये प्रयोग की थी, आपका नाम भी उल्लेखित किया था ,ताकि एक कलाकार को उसका पूरा सम्मान मिलें ,लेकिन आपके पिछली २-३ बार जो आपने दीवार पर लिखा उसे देख कर लगा शायद आपको दूसरों की रचनाएं अपनी दीवार पर उचित नही लगती है ! कलाकारो मे यह सोच बहुत ही संकुचीत प्रव्रत्ती को दर्शाती है ।मैने आपकी भावनाएँ समझते हुये आपकी दीवार से अपनी रचनाएँ हटा दी है ,साथ ही बडे दुखी मन से आपको दोस्त सूची में से भी अलग कर दिया है।' ऐसे ही एक संदेश के जवाब में घुन ने लिख दिया 'महात्मा फुन्तुरु .. आप को ऐसा लगा ....मैं माफ़ी चाहूगाँ .........आपने अपनी दोस्त सूची से मुझ तुच्य घुन को हटाया ये आपका निर्णय है मैं इसका भी सम्मान करता हूँ | मेरे लिये ग्राम फेसबुक में मित्र सूची का लंबा होना कोई मायने नहीं रखता | आप को मैं हमेशा अपना मित्र मानता रहूगां , आगे आपकी मर्जी, धन्यवाद|', दोस्तों कहानी यही समाप्त नहीं होती इस घटना के बाद महात्मा फुन्तुरु ने सन्देश भेजना बन्द कर दिये और अब महात्मा फुन्तुरु वे नये ब्रह्म अस्त्र के आविष्कार में जुट गये है|

जैसा की आप सभी को पता है महात्मा फुन्तुरु अपने वरिष्टों के ही विचारों को ग्राम फेसबुक में प्रचरित करते है और उसका मूल्य भी बस अपना नाम उशे साथ जोड़ना है और कुछ नहीं, जो उनकी नज़र में जायज़ भी है| पर दोस्तों बुरा वक्त किसके जीवन में नहीं आता| महात्मा फुन्तुरु के जीवन में भी बुरे वक्त ने दस्तक दे डाली| जाने क्या हो गया दीवार पर लिखने के लिये विचार ही नही मिल रहे थे, जो मिल रहे थे सब पुराने, भतेरी दीवारे खोज डाली मगर कुछ मिला ही नहीं| महात्मा फुन्तुरु बेहाल, क्या करें?, कैसे करें?, कहाँ से लाये?, क्या उठायें? ऊपर से मित्रों और शिष्यों के सवाल, कहाँ हो गुरुदेव?, बड़ा सूना सूना लग रहा है ग्राम?, स्वास्थ तो खराब है नहीं? क्या बात है आज कुछ नया नहीं? महात्मा फुन्तुरु की झन्नाहट और बौखलाहट जब चरम पर पहुच गई तो महात्मा फुन्तुरु ने अपनी दीवार पर लिखा 'क्या जरुरी है के रोज कुछ न कुछ लिखा ही जाए अपनी दीवार पर?, आप एक दिन भी बिना लिखे नहीं रह सकते?, अपना अपना काम करें|' बस फिर क्या था जो होता आया है वही हुआ लग गई झड़ी टिप्पणियों की 'हां सही है', 'मै आपके साथ हूँ', वाह क्या बात है आईना दिखा दिया' पर महात्मा फुन्तुरु भूल गये की वक्त बुरा है और बुरे वक्त में परछाई भी साथ छोड़ जाती है| और उनकी ही एक बुरी परछाई ने एक टिप्पणी रूपी कालिख महात्मा फुन्तुरु की दीवार पर कुछ यूँ जड़ दी 'आपको ये लिखने की क्या जरूरत है महात्मा फुन्तुरु, क्या आपके पास भी कोई काम नहीं?', महात्मा फुन्तुरु हिल गये और परछाई पर पिल गये|दोस्तों, कहानी यहीं खत्म नहीं होती है, इसके बाद सैदव के लिये महात्मा फुन्तुरु को एक बुरी परछाई से निजात मिल गई|