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Friday, 4 May 2012

व्यंग : फुन्तुरु बाबा का शंका समाधान


(फुन्तुरु बाबा का दरबार लगा है, बाबा अपने लेपटोप पर तन्मयता से फेसबुक पर कुछ कुछ कर रहे है| गले में हेडफोन शोभायमान है, टकर टकर की मधुर ध्वनि गुंजायमान है| इतने में चेला प्रमुख पाखंड और अन्य चलों का लोंग इन (प्रवेश) होता है|
चेला प्रमुख पाखंड : फुन्तुरु बाबा की फुर्र हो .......
बाँकी चेले (एक साथ) : फुर्र फुन्तुरु बाबा...फुर्र फुर्ररर
फुन्तुरु बाबा : बैठो, क्या प्रश्न लाये हो बालक?
चेला गुड गोबर दास, चोला लाल और उज्जवल कल्लू  : ३ लाइक, १ शेयर
(सभी चेले बैठते हुये)    
चेला प्रमुख पाखंड : बाबा प्रश्न-मश्न तो कोई नहीं |
बाँकी चेले (एक साथ) : कोई नहीं, कोई नहीं बाबा
फुन्तुरु बाबा : फिर क्यू आये हो?
चेला घोंचू सिह, खुल्लखुल्ल प्रसाद : २ लाइक
चेला प्रमुख पाखंड : बाबा एक बात-मात कहनी थी ...
बाँकी चेले(एक साथ) : कहनी थी, कहनी थी बाबा
फुन्तुरु बाबा : कहो
चेला कीड़ाकान्त : १ लाइक, १ शेयर
चेला प्रमुख पाखंड : बाबा अपने मार्केट-शार्केट में एक नया ब्रांड-श्रांड बड़ी धूम मचा रहा है ...
बाँकी चेले(एक साथ) :नया ब्रांड-श्रांड, नया ब्रांड-श्रांड बाबा
फुन्तुरु बाबा : नया ब्रांड! कौन सा बच्चा
चेला चिल्लपों, काएं मल, छिछोरी छुरी : ३ लाइक, २ शेयर
चेला प्रमुख पाखंड : बाबा कोई निर्मल-उर्मल है
बाँकी चेले(एक साथ) : निर्मल-उर्मल, निर्मल-उर्मल बाबा
फुन्तुरु बाबा(एक कातिलाना मुस्कान के साथ) : अच्छा, तो तुम क्यू चिंतित हो ??
चेला छीनेटी, कुप्पा, वक्र बाती, चालू भोला : ४ लाइक, २ शेयर   
चेला प्रमुख पाखंड (चिंतित स्वर में) : बाबा अपनी तो वाट-साट लग रही है, लोग आज-कल चंदा-बंदा नहीं देते
बाँकी चेले(एक साथ) : चंदा-बंदा, चंदा-बंदा बाबा
फुन्तुरु बाबा : हूऊऊउ.....
चेला तुच्यासुर, सर्वस्वार्थी, विवेकामंद : ३ लाइक
चेला प्रमुख पाखंड : बाबा सुना है वों २००० हजार तो बस दर्शन-फर्शण के ही ले लेता है..........और टी.व्ही.-ऊ.व्ही पर अलग आता है.......वों रामदेव बाबा भी पिछड़-उछड रहे है उससे.......और दो चार बाबा तो सब त्याग व्याग कर ......सच के सन्यासी-चन्यासी  हो गये है और सुनने सुनाने में तो ये भी आया है .....के वों खुद ही जूनियर-फुनियर कलाकार लाकर, उनसे प्रश्न-मश्न पुछवाता है.....और टी.आर.पी बड़ाता है ........दो चार नेता-पेता बरगला ले तो कोई बड़ी बात नहीं .......और तो करोडोँ तो रोज खाते-जाते में जमा होते है ........अभी तो हमारी शुरुवात ही है प्रभु .....ऐसा ही चला तो कैसे काम-शाम चलेगा ........
चेला चेंट चुपिकू : १ लाइक
बाँकी चेले : काम-शाम, काम-शाम बाबा ....
फुन्तुरु बाबा (कुछ सोच कर, एक दार्शनिक अंदाज में) : बेटा तुम चिंता मत करो, कोई बाबा किसी बाबा का दुश्मन नहीं होता, सब एक दूजे को रास्ता देते है, और तुम इस देश की मानसिकता को समझों, यहाँ बाबाओ को फोलो करना फैशन है, कल कोई और था आज कोई और है और कल हम होंगे| जैसे पहले धोती कुर्ते का फैशन था, फिर कुर्ता पजामा आया, फिर पतलून बुस्सेट का, फिर जीन्स टी-शर्ट का, फिर केप्री टी-शर्ट का और अब चड्डा-बनियान का ऐसे ही बाबाओ के दौर भी आते है| और निर्मल बाबा कुछ गलत नहीं करते जो कलाकारों को पैसे देकर प्रश्न पूछते है, अरे हम क्या झूटे लाइक नहीं बटोरते, क्या नेता नोट देकर वोट नहीं लेते और इसके लिये सबसे ज्यादा तो मीडिया जिम्मेदार है, पैसा लेकर न्यूज बनाते भी है और दवाते भी है| निर्मल बाबा तो बेचारे है जो चैनल उनके विज्ञापन दिखाता है, बही न्यूज में धज्जियाँ उडाता है, और न्यूज चैनल बालो को भी दोष देना ठीक नहीं, साली टी.आर.पी है ही इतनी कुतिया चीज| अब सवाल रहा नेता का तो बेटा जो नेता अपनी पार्टी का नहीं होता वों क्या किसी बाबा का होगा| बेटा बाबागिरी में तो अब भी पैंदी है, पर नेतागिरी की लुटिया की पैंदी कब की घिस गई | बेटा एक एक बाबा सौ सौ नेताओं को पाल सकता है, उदाहरण तुम्हारे सामने है, सोना फोन, इस्कुल-फिल्कूल, अस्पताल-आडम्बर क्या क्या नहीं किया बाबाओं ने और शुरुवात में ही डर जाओगें तो कैसे काम चलेगा, और ये निर्मल से डरने की तो वैसे भी जरुरत नहीं न तो कोई न तो कोई ट्रस्ट है न कोई कथित समाजसुधारक गतिविधि, इस सब चीजों से सबक लों और काम पर लगों|
चेला प्रमुख पाखंड, चेंट चुपिकू, गुड गोबर दास, चोला लाल, उज्जवल कल्लू, घोंचू सिह, खुल्लखुल्ल प्रसाद, कीड़ाकान्त, चिल्लपों, काएं मल, छिछोरी छुरी, छीनेटी, कुप्पा, वक्र बाती, चालू भोला, तुच्यासुर, सर्वस्वार्थी, विवेकामंद, चेंट चुपिकू : २० लाइक, १५ शेयर
चेला प्रमुख पाखंड: बाबा मगर वों चंदे-बंदे वाली बात-सात तो रह ही गई
बाँकी चेले(एक साथ): बात-सात, बात-सात बाबा
फुन्तुरु बाबा: अरे कहाँ ना हर कुत्ते के दिन आते है, हमारे भी आयेगे, अब चलो, फेसबुक पर अन्य शिष्य भी इतजार में है ...
प्रमुख पाखंड, चेंट चुपिकू, गुड गोबर दास, चोला लाल, उज्जवल कल्लू, घोंचू सिह, खुल्लखुल्ल प्रसाद, कीड़ाकान्त, चिल्लपों, काएं मल, छिछोरी छुरी, छीनेटी, कुप्पा, वक्र बाती, चालू भोला : ९ लाइक, ५ शेयर 
सभी चेले (जाते हुये यानि लोंग आउट करते हुये) : फुर्र फुन्तुरु बाबा...फुर्र फुर्ररर, फुर्र फुन्तुरु बाबा...फुर्र फुर्ररर
फुन्तुरु बाबा : १ लाइक, १ शेयर
~ ©अमितेष जैन 

व्यंग : ग्राम फेसबुक में महात्मा फुन्तुरु


ग्राम फेसबुक में एक महात्मा है महात्मा फुन्तुरु| महात्मा फुन्तुरु के ५००० हजार मित्र और ३००० के करीब अभिदाता (subscriber) है| महात्मा फुन्तुरु जो दीवार पर लिख दें वो पत्थर की लकीर , किसी की क्या हिमाकत जो महात्मा फुन्तुरु की बात का विरोध करें (हां ते बात और थी की विचार उनके अपने न होते थे वे बस अपने वरिष्ठों के विचारों का बखान करते थे ...अब इसके लिये वें आपना नाम साथ में लिख देते थे ...बस यही कीमत थी विचारों के बखान की ) और ऐसा होने पर उनके मित्र, शिष्य, सहियोगी जो खैर ख़बर लेते थे कि बन्दा फेसबुक ग्राम में निकलने से डरने लगता था| बात एक दिन कि है जब महात्मा फुन्तुरु ने अपनी दीवार पर लिखा 'मूर्खो से तर्क न करों, वें पहले अपने तर्कों से अपनी बराबरी पर लाते है, फिर उन्ही कुतर्कों से आपको परास्त करते है|', बस फिर क्या था वाह वाह, सहमत हूँ, सही कह रहे है आप आदि टिप्पणीयों की बौछार चालु अभी ५०-५५ टिप्पणियाँ ही हो पाई थी कि किसी मुर्ख ने लिख दिया ' ऐसी बाते बस बही लोग करते है जो दूसरों को समझाने में सक्षम नहीं होतें|' और महात्मा फुन्तुरु को ज्ञान प्राप्त हो गया उन्होंने तुरंत ही अपना लिखा हटा दिया | दोस्तों कहानी यहीं खत्म नहीं होती, अगले दिन महात्मा फुन्तुरु की दीवार पर लिखा था 'आप मूर्खो से भी बहुत कुछ सीख सकते है|'

महात्मा फुन्तुरु की एक आदत सबसे निराली है वें केवल उन्ही को मित्र बनाते है जो उनकी हाँ में हाँ मिलाते है| उनकी दीवार पर वाह-वाही करते है और उनके दीवार पर लिखा प्रचरित करते है| पर आप गेहूँ पिसवाने जाओ तो घुन आ ही जाता है इसी तरह ग्राम फेसबुक में कौन गेहूं है और कौन घुन आप नहीं जान सकते| तो महात्मा फुन्तुरु की दोस्त सूची में कुछ धुन चिपक गया| जब बार बार प्रयत्न करनें के बाद भी महात्मा फुन्तुरु किसी घुन को गेहूँ बनाने ने असफल होते तो वों उस पर ब्रह्म अस्त्र का प्रोयोग करते| वें बस घुन को एक सन्देश भेजते| संदेश कुछ ऐसा होता 'प्रिय घुन , आप ऎक अच्छे कलाकार है , मै अपनी दीवार पर कई संगीतकारो , लेखको ,शायरो ऐंव कलाकारों से जुडा हुआ हूं । मैने आपकी टिप्पणी अपनी दीवार पर आपको पुरा सम्मान देते हुये प्रयोग की थी, आपका नाम भी उल्लेखित किया था ,ताकि एक कलाकार को उसका पूरा सम्मान मिलें ,लेकिन आपके पिछली २-३ बार जो आपने दीवार पर लिखा उसे देख कर लगा शायद आपको दूसरों की रचनाएं अपनी दीवार पर उचित नही लगती है ! कलाकारो मे यह सोच बहुत ही संकुचीत प्रव्रत्ती को दर्शाती है ।मैने आपकी भावनाएँ समझते हुये आपकी दीवार से अपनी रचनाएँ हटा दी है ,साथ ही बडे दुखी मन से आपको दोस्त सूची में से भी अलग कर दिया है।' ऐसे ही एक संदेश के जवाब में घुन ने लिख दिया 'महात्मा फुन्तुरु .. आप को ऐसा लगा ....मैं माफ़ी चाहूगाँ .........आपने अपनी दोस्त सूची से मुझ तुच्य घुन को हटाया ये आपका निर्णय है मैं इसका भी सम्मान करता हूँ | मेरे लिये ग्राम फेसबुक में मित्र सूची का लंबा होना कोई मायने नहीं रखता | आप को मैं हमेशा अपना मित्र मानता रहूगां , आगे आपकी मर्जी, धन्यवाद|', दोस्तों कहानी यही समाप्त नहीं होती इस घटना के बाद महात्मा फुन्तुरु ने सन्देश भेजना बन्द कर दिये और अब महात्मा फुन्तुरु वे नये ब्रह्म अस्त्र के आविष्कार में जुट गये है|

जैसा की आप सभी को पता है महात्मा फुन्तुरु अपने वरिष्टों के ही विचारों को ग्राम फेसबुक में प्रचरित करते है और उसका मूल्य भी बस अपना नाम उशे साथ जोड़ना है और कुछ नहीं, जो उनकी नज़र में जायज़ भी है| पर दोस्तों बुरा वक्त किसके जीवन में नहीं आता| महात्मा फुन्तुरु के जीवन में भी बुरे वक्त ने दस्तक दे डाली| जाने क्या हो गया दीवार पर लिखने के लिये विचार ही नही मिल रहे थे, जो मिल रहे थे सब पुराने, भतेरी दीवारे खोज डाली मगर कुछ मिला ही नहीं| महात्मा फुन्तुरु बेहाल, क्या करें?, कैसे करें?, कहाँ से लाये?, क्या उठायें? ऊपर से मित्रों और शिष्यों के सवाल, कहाँ हो गुरुदेव?, बड़ा सूना सूना लग रहा है ग्राम?, स्वास्थ तो खराब है नहीं? क्या बात है आज कुछ नया नहीं? महात्मा फुन्तुरु की झन्नाहट और बौखलाहट जब चरम पर पहुच गई तो महात्मा फुन्तुरु ने अपनी दीवार पर लिखा 'क्या जरुरी है के रोज कुछ न कुछ लिखा ही जाए अपनी दीवार पर?, आप एक दिन भी बिना लिखे नहीं रह सकते?, अपना अपना काम करें|' बस फिर क्या था जो होता आया है वही हुआ लग गई झड़ी टिप्पणियों की 'हां सही है', 'मै आपके साथ हूँ', वाह क्या बात है आईना दिखा दिया' पर महात्मा फुन्तुरु भूल गये की वक्त बुरा है और बुरे वक्त में परछाई भी साथ छोड़ जाती है| और उनकी ही एक बुरी परछाई ने एक टिप्पणी रूपी कालिख महात्मा फुन्तुरु की दीवार पर कुछ यूँ जड़ दी 'आपको ये लिखने की क्या जरूरत है महात्मा फुन्तुरु, क्या आपके पास भी कोई काम नहीं?', महात्मा फुन्तुरु हिल गये और परछाई पर पिल गये|दोस्तों, कहानी यहीं खत्म नहीं होती है, इसके बाद सैदव के लिये महात्मा फुन्तुरु को एक बुरी परछाई से निजात मिल गई|

व्यंग : आपकी चोरी की प्रतीक्षा में




आदरणीय रचनाएँ चोरी करने बाले बंधुबर,
कोटि कोटि नमन,



        हे वीर पुरुष, हे श्रेष्ठ मानव, नमन, ये पत्र आपको धन्यवाद कहने के लिये लिख रहा हूँ| सुना है (और देखा भी है) आप रचनाएँ चोरी कर अपने चिठ्ठे (ब्लॉग) पर और दीवार पर लगाते है| बहुत अच्छा करते है| जिन रचनाओं की और किसी का ध्यान नहीं जाता आप उसे जन जन तक पहुचाते है| प्रभु कभी मुझ जैसे तुच्च पर भी अपनी कृपा कीजिये| कभी कभी तो आप अपना नाम भी किसी चोरी की रचना के नीचे लिख देते है या विशेष मानसिक स्थिति में आप बिना नाम के ही रचना चिपका देते है| बेचारे लेखक क्या जाने कि आप कितने बड़े कार्य को अंजाम दे रहे है| ये जानते हुये की रचनाओं को चोरी करने पर रचनाएँ आपकी नहीं हों जायेगी, आपका साहस देखते बनता है| हे कृपालु कभी हमारी रचनाओं की तरफ भी एक नज़र डालिए| मैं जानता हूँ की आप ये भी जानते है की इससे आप किसी विधा के विद्वान नहीं बन पायेगे , आप तन्मयता से आपने कार्य में लगे है| वैसे तो आप सर्वज्ञानी है पर हे दीनानाथ कुछ लेखक आपके इस कार्य से आपसे रुष्ट हो जाते है, वे अज्ञानी है उन्हें माफ कर दीजिये| आप जैसे भोले लोगों की ये दुनियां है ही नहीं, आप तो बस चोरी को एक कला के रूप में मानते है और उसी की साधना में व्यस्त रहते है| जहाँ लेखक अपनी श्रेष्ठ रचनायों के चयन में चूक जाता है, आप उस रचना को प्रेषित करते है, लेखक को दंड मिलना ही चाहिये, वह चूका कैसे? हे न्याय के देवता कुछ लोग आपको धूर्त, बेईमान, चोर और न जाने क्या क्या कहते है, मुझे तो दुःख होता है, वे नादान है नही जानते की आप तो बस 'मेड इन इंडिया' की परम्परा को आगे बड़ा रहे है| प्रभु आपने कितने ही रचनाकारों, लेखकों और कवियों को बड़ा बना दिया है, असल में आप जिन लेखकों की रचनाएँ चुराते है, वे अच्छे ही होते है, उन्हें आपके इस कार्य से नाम तो मिल ही जाता है, आप छोटे, बड़े का फर्क बताते है| मेरी आप से सविनय विनती है की मुझे अपने चिठ्ठे (ब्लॉग) पर और दीवार आश्रय दीजिये| भूल चूक माफ कीजिएगा|


आपकी चोरी की प्रतीक्षा में 
~अमितेष जैन

Thursday, 3 May 2012

कहानी : भीख



"ए दो रुपया दें" बुडिया ने कहा | "चल आगे" राज ने कहा |
"बेटा भगवान तेरा भला करेगा" बुडिया ने कहा |
"बोला न बुडिया चल आगे" राज कुछ और बिगड़ कर ने कहा |
"बेटा ऐसे नाराज़ नहीं होते, दो रूपया दे चाय पियुगी" बुडिया ने फिर कहा|
"एरे तू जाती है नहीं, आ जाते है मागंने भिखारी कंही के, चल जा कंही और जा के मांग" राज लगभग चीखते हुये कहा ने कहा और इतनी जोर से के आस पास के लोग उसे देखने लगे |
ठीक है बेटा, भगवान तेरी हर मुराद पूरी करे, तू बड़ा आदमी बने’ बुडिया ने डरते हुये कहा और जाने लगी |
राज सोचने लगा |
जिंदादिल और हँसमुख राज को वैसे कभी गुस्सा नहीं आता था| पर आज उसका दिमाग सुबह से ही खराब था| दो दिन पहले मुम्वई आया था नौकरी कि तलाश में | दो साल हुये पढाई पूरे किये | कोई काम नहीं मिला | ऐसा नहीं था की वों न कमाए तो उसका परिवार मर जाएगा, पिता की अच्छी नौकारी है, अपना घर है, कोई खास परेशानी नहीं | पर हर पिता की तरह राज के पिता का भी बस यही सपना है, की राज अपने पैरों पर खड़ा हो जाए, इसलिये उस पर कुछ ज्यादा दबाब डालते है| और यही हाल माँ का है वों हमेशा राज का साथ देती है, पर पिता के रोज रोज दिये जाने वाले तानों ने माँ को भी ऐसा कर दिया था की वों भी पिता की हां में हां मिलाने लगी थी और राज को जब चाहे डाट देती थी| लगभग सभी दोस्त कुछ न कुछ काम धंधा करने लगे थे | और अब तो हालत ये थी की राज के पास कोई नहीं था जिससे वों बात भी कर सके|
                              अभी चार दिन पहले राज के पिता के एक मिलने वालो ने बताया की उनकी कोई जान पहचान है मुम्वई में जहाँ राज को काम मिल सकता है| और राज आगया मुम्वई, वैसे ऐसा नहीं था की राज को आता जाता ही न था पर जहाँ साक्षात्कार था वहाँ बात न बन सकी, क्यों की काम कुछ अलग था और राज ने कुछ और पड़ा था| जब माँ और पिता को पता लगा की वहाँ भी कुछ काम नहीं मिला तो वों राज को फिर सुनाने लगे खरी खोटी| राज चुप रहा कुछ न बोल सका, बस अब तो उसे लगता था की सुनना उस नसीब बन गया है| जो है वों उस बेचारें बेरोजगार को पहले आपनी शौर गाथाएँ सुनाता फिर राज को उसकी नाकामयाबी पर भाषण|
                           बस इसी परेशानी के साथ राज स्टेशन पर बैठ कर अपनी गाड़ी की प्रतीक्षा कर रहा था और वों भिखारन आ गई, अपनी कुंठा में राज उस पर चिल्ला उठा | पर जाते जाते जो उस भिख्रण ने बोला राज के दिल को छु गया| जब सभी उसे नाकारा और बेकाम समझकर उसपर चिल्लाते है तो उसे कैसा लगता है और बुडिया ने उसके डाटने के बाद भी उसे आशीर्वाद दिया| राज भर उठा| उसने आस पास देखा | बुडिया अब भी बहीं थी | राज के पास बैठे एक और यात्री से भीख मान रही थी | राज बुडिया के पास गया और बोला “ चाय पियोगी अम्मा “
भिखारन ने डरते सहमते हुये अपना सिर हां में हिलाया |
राज में भिखारन को चाय खरीद के दी |
भिखारन ने भी राज को विना कुछ बोले धीरे से हाथ उठाकर आशीर्वाद दिया|
जिससे राज को जाना था वों गाड़ी आ चुकी थी| राज ने अपनी बर्थ पर सामान रखा| कम्बल निकाल कर सिर से पैर तक खुद को ढक लिया| आँखों में आसू लिये राज कब सो गया उसे भी पता न लगा|

Friday, 27 April 2012

व्यंग कथा : मेरी प्रथम काव्य गोष्टी


दोस्तों, आज आपके सामने पेश है मेरी प्रथम काव्य गोष्टी की रिपोर्ट....
मेरे शहर के पास के एक कस्वे से बुलावा आया| बुलावा भेजा था वहाँ के एक साहित्यकार जी ने| सुबह फोन बजा, उठाया मैंने,
उधर से आवाज आई....”नमस्ते भाई कैसे हो”,
मैंने कहा, “बढिया ....”
साहित्यकार जी ने कहा,”आज शाम को आजाओ एक गोष्टी है”
मैंने कहा, “जी .. ”
साहित्यकार जी ने कहा,”सही शाम ७ बजे पहुच जाना ... ”
मैंने कहा, “जी .. ”
साहित्यकार जी ने कहा,”घर तो देखा है ... ”
मैंने कहा, “जी ”
साहित्यकार जी ने कहा,”फिर मिलते है शाम को ... ”
मैंने कहा, “बिलकुल .... ”
साहित्यकार जी ने कहा,”वों फलां फलां भी आ रहे है .. ”.
मैंने कहा, “अच्छा .. ”
साहित्यकार जी ने कहा,”उन्हें भी लेते आना ”
मैंने कहा, “जी ”
साहित्यकार जी ने कहा,”ठीक है ...रखु .. ”
मैंने कहा, “जी”
तो जानाब यहाँ नया नया रोग था, मन तो हिरणों से ऊची छलागें मारने लगा, आखें घड़ी घड़ी, घड़ी देखने लगी, चार पाँच उच्चकोटि की कविताएं, दो चार ग़ज़ल याद की गई, एक कुर्ता, एक घड़ी की व्यवस्था की गई, दाड़ी ऊड़ी बना बनू के, एकदम चकाचक|
पहुचे साहब कस्वे में , घड़ी देखी, ६:३० हुये थे, हमारे साथ जो फलां फलां थे, बोले,”देखो दोस्त ७:४५ से पहले मत जाना, नहीं तो कोई इज्जत नहीं रहेगी|”
मैंने कहा,”पर समय तो ७ बजे का है”
फलां फलां बोले,”उससे क्या,बेटा अब तुम साहित्यकार बनने जा रहे हो, और समय पर पहुचकर क्यों अपनी इम्पोट्स घटा रहे हो, चलते है मिया एक आध फुक्की-सुक्की हो जाये|”
मैंने कहा,”जी जैसा आप कहें|”
फलां फलां बोले,”तो चलो, चौरसिया की दुकान पर”
मैंने कहा,”जी”
तो जनाब, चौरसिया की दुकान पर फलां फलां कश लेते रहे और हम उनकी बातो का रस लेते रहे| फिर ७:३० पर आदेश हुआ, चलो अब चलते है और हम चल दिये उनके साथ |
फलां फलां के प्लान के अनुशार हम सही ७:४५ पर खड़े थे, साहित्यकार जी की चौखट पर, साहित्यकार जी, पूरी श्रद्दा से स्वागत को आतुर, पहुचते ही बोले, "अरे देर हो गई आप लोगो को"
फलां फलां बोले," इतना तो चलता है"
और दोनों हँस दिये, हम भी मुस्कुरा दिये
साहित्यकार जी बोले, "चलिए अंदर चलिए"
और साहब चल दिये हम अंदर, अंदर था एक गुफा नुमा कमरा, कमरे में एक टेवल पर सरस्वती माता विराजमान थी, और फर्श पर चार अन्य मित्रगण, दो मित्र अपने मोबाइल पर आपस में बिलुटूथ पर कुछ आदान-प्रदान कर रहे थे, और जो दो और थे वों, किसी सांसद की माँ, बहनों की सेवा कर रहे थे|
पहुचते ही साहित्यकार जी ने परिचय कराया, और फिर सब लग गये अपने कामो में, मैं और फलां फलां एक किताब को खोलकर ग़ज़लें पड़ने लगे| इतने उस गुफा की मांद में दो अन्य का प्रवेश हुआ, साहित्यकार जी ने परिचय कराया और सरस्वती माता के पास जाकर बोले
"दोस्तों आप जानते ही है, आज हम यहाँ क्यू उपस्तिथ है"
उनका इतना कहना ही था की बत्ती गुल यानि की बिजली गई| इसके बाद सब ने बारी बारी से बिजली वालो को याद किया, और हिन्दी की सहायक क्रियाओं से उन्हें नवाज़ा| और फिर साहित्यकार जी को भी लगे हाथ दो चार सुना डाली| साहित्यकार जी भी कम तो थे नहीं उन्होंने भी सहायक क्रियाओं के अपने ज्ञान का उदाहरण प्रस्तुत किया और मैंने सोचा भाई क्या फायदा हुआ चकाचक आने का| फिर एक दीपक और कुछ मोमबत्तियाँ मंगाई गई और उस केंडल लाईट माहौल में गोष्टी को प्रारम्भ किया गया|  साहित्यकार जी फिर बोले, " मैं आज की गोष्टी का फलां फलां को आमंत्रित करूगाँ के वे आये, और और दीप प्रज्जोलन कर गोष्टी का आरम्भ करे|”
फलां फलां बोले,” दीप तो पहले से ही प्रज्जोलित है साहित्यकार जी|” साहित्यकार जी फिर बोले, “ मेरा मतलब माता के चरणों के समक्ष दीप प्रज्जोलन से था|” फलां फलां बोले,” वों तो ठीक है, पर मुख्य अतिथि और विशिष्ट अतिथि को और बुलाइए|”
हाँ, साहित्यकार जी कुछ सोचकर बोले,” मैं श्री मित्र नंबर एक से गुजारिश करूगां कि वे भी दीप प्रज्जोलन में सहियोग करें और मुख्य अतिथि का पद स्वीकार करें|”
मित्र नंबर एक तत्काल ही बोले, “साहित्यकार जी  अरे हम काहेके अतिथि हम तो आप के घर के सदस्य है, और आप कृपा कर श्री मित्र नंबर दो को मुख्य अतिथि बनाये|” साहित्यकार जी फिर बोले, “ ठीक है मैं श्री मित्र नंबर दो से अनुरोध करूगां कि ....” साहित्यकार जी की बात पूरी भी न हो पाई थी की श्री मित्र नंबर दो बोल पड़े,” यानी की साहित्यकार जी आप मुझे अपने घर का सदस्य नहीं मानते|”
साहित्यकार जी फिर बोले,” अरे मानता क्यूँ नहीं पर गोष्टी ...”
साहित्यकार जी की बात फिर आधूरी रह गई, श्री मित्र नंबर दो फिर बोले,” अच्छा अच्छा ठीक है पर मित्र नंबर एक यदि विशिष्ट अतिथि के रूप में यदि साथ आये|” इतना कहकर वे उठे और साथ में मित्र नंबर एक भी उठे, और हँसते हुये माता के समक्ष जा खड़े हुये, जैसे तैसे दीप प्रज्जोलन हुआ|
फिर साहित्यकार जी बोले, “मैं संचालन के लिये श्री मित्र नंबर तीन को आमंत्रित करता हूँ|” मित्र नंबर तीन अपनी जगह पर बैठे बैठे बोले,” साहित्यकार जी सरस्वती वंदना के लिये किसे आमंत्रित करूँ??”
साहित्यकार जी बोले, “यार किसी को भी आमंत्रित कर लों|”
इतने में फलां फलां बोले, “ यार संचालन तुम कर रहे हो या साहित्यकार जी??” मित्र नंबर तीन बोले, “ ठीक है .....मैं मित्र नंबर चार से कहुगां की वे सरस्वती वंदना करें|” इस पर मित्र नंबर चार ने बिगडते हुये कहा, “क्या यार तुम भी संचालन तो आता नहीं, कहुगां मतलब क्या, अनुरोध करुगा|”
मित्र नंबर तीन बोले, “ हां हां बही, अनुरोध करुगा|”
मित्र नंबर चार ने नानुकर करने की बाद एक सरस्वती वंदना गाई, सब ने तालियाँ बजाई, और फिर संचालक महोदय बोले,’’ साहित्यकार जी अब रचना पाठ के लिये किसे आमंत्रित करूँ”
फलां फलां फिर बीच में बोल पड़े,” यार फिर बही बात, संचालन तुम कर रहे हो या साहित्यकार जी???”
मित्र नंबर तीन बोले, “ ठीक है मैं मित्र नंबर पाँच से अनुरोध करूगां (ये शब्द उन्होंने थोड़ा जोर देकर मित्र नंबर चार की और देखते हुये कहे) कि वे प्रथम काव्य पाठ करें|”
मित्र नंबर पाँच (थोड़ा चौककर) बोले.” यार तुम भी न बस, टेम तो देखते नहीं, अरे में ये फ़ाइल ट्रांसफर कर रहा हूँ, ये तो हो जाने देते|”
इतने में साहित्यकार जी बोले, “ क्या यार तुम साले, फ़ाइल ट्रांसफर करने आये हो या काव्य पाठ करने??”
मित्र नंबर पाँच बोले,” चलो मैं काव्य पाठ कर देता हूँ, फ़ाइल ट्रांसफर तो होती रहेगी, बिलुटूथ का ये ही तो फायदा है””
एकदम से मित्र नंबर छ: बोल पड़े,” यार तुम्हारे मोबाइल में बिलुटूथ है, कौन सा मोबाइल है, कितने का लिया??”
मित्र नंबर पाँच बोले,”मेरे साले का है, एन सीरीज का”
मित्र नंबर छ: बोले,”बताना जरा“
मित्र नंबर पाँच बोले,” अभी डाटा सेंड हो रहा है| “
फलां फलां ने बीच में टोका,”यार हम काव्य गोष्टी के लिये आये है मोबाइल देखने नहीं|”
मित्र नंबर पाँच ने फिर कुछ ना कहा और वीर रस की दो कविताएं पढ़ डाली, संचालक महोदय को देखा और मोबाइल हाथ में लिया|
संचालक महोदय ने धन्यावाद दिया, और बोले,” अब मैं मित्र नंबर एक से अनुरोध करूगां की वे काव्य पाठ करें|”
फिर क्या था संचालक महोदय अनुरोध करते रहे और काव्य पाठ होते रहे, और आब बारी मेरी थी|
मैंने जैसे ही मुह खोला बिजली आगयी| सब एक साथ बोले वाह वाह, तभी साहित्यकार जी बोले, “कुछ कहने तो दो बालक को, वाह वाह फिर करना”
इस पर फलां फलां बोले, “साहित्यकार जी आप टेसू के टेसू रहोगे, अरे बिजली आई है, जश्न तो बनता है|”
इस पर संचालक महोदय ने तुर्रा छोड़ा,” साब ऐसा जश्न तो हम दिन में दस बार बनाते है”
इस पर सब फिर बोले,”वाह वाह”
फलां फलां ने मुझ कहा, “तुम चालु करो यार मुझे भूख लगी है”
मित्र नंबर एक उचके, “ कविता की??”
फलां फलां फिर बोले,” यार टीम चुप रहो, उलटी बात ही करोगें|” फिर मेरी ओर देखते हुये “ तुम बोलो यार|”
मैंने भी जल्दी से काव्य पाठ चालु किया कि और कोई कुछ न बोल पाए| काव्य पाठ खत्म हुआ ही था की साहित्यकार जी ने आदेश दिया “पहले पेट पूजा फिर काम दूजा” तब तक चाय और पकोड़े आ चुके थे, सभी ने नाश्ते का लुफ्त उठाया और फिर  संचालक महोदय तन के बैठ गये एक डकार ली और बोले,” अब मैं आमंत्रित करुगा श्री फलां फलां को”
जब श्री फलां फलां पर सब की नज़रे पड़ी तो फलां फलां ऊँघ रहे थे
संचालक महोदय फिर जोर से बोले,” फलां फलां जी, अरे सुन रहे हो??”
फलां फलां झटके से उठे और बोले, “ वाह वाह”
संचालक महोदय बोले, “ वाह वाह बाद में करना फिर रचनाएँ सुनाओ”
फलां फलां ने कहा, “ठीक है|” अभी फलां फलां पहला मिसरा ही पढ़ रहे थे कि मित्र
नंबर छ: बोले,” यार ये तो राना जी का है”
फलां फलां बोले,” सुन तो लों यार”
मित्र नंबर छ: बोले,” तो अपना सुनाइये”
फलां फलां बिगड़ गये, ”नहीं सुनाना वें, करले क्या करेगा, साहित्यकार जी अबके यदि ये आया तो मुझे मत बुलाना, गोष्टी खत्म भाई चलो सब अपने अपने घर को”
साहित्यकार जी बोले, “अरे नाराज ना होइए|” फिर मित्र नंबर छ: की ओर देखते हुये बोले, “तुम चुप रहो यार|”
मित्र नंबर छ: ने आव देखा ना ताव और उठे और चल दिये गुफा से उनके पीछे पीछे मित्र नंबर चार और पाँच भी ये कहते हुये निकल लिये, “ अरे सुनों यार, बात तो सुनों ...”
फलां फलां जो पहले से गुस्से में थे बोले,” सारा मूड खराब कर दिया दिया” और फिर सहायक क्रियायों का इस्तमाल किया और उठ खड़े हुये और मुझसे बोले चलो यार तुम यहाँ आना ही नहीं चाहिये था, जनाब बहुत रोका सबने पर वे ना माने और काव्य गोष्टी का समापन हो य गया|
मैं और फलां फलां, अभी थोड़ी दूर तक ही आये थे के मिल गये मित्र नंबर छ;, चार और पाँच,  मित्र नंबर छ; फलां फलां से बोले, “चले चौरसिया की दुकान पर” और लगाया एक ठहाका सब ने| और निकल पढ़े सब के सब  चौरसिया की दुकान पर कश का रस लेने”
~ ©अमितेष जैन