Showing posts with label कहानी. Show all posts
Showing posts with label कहानी. Show all posts

Friday, 4 May 2012

कहानी : लव स्टोरी


शाम का समय था, ठन्डे जा रही थी और गर्मियाँ आने को थी, मौसम ज्यादा खुशगवार होता है इन दिनों, एक आजीब सी महक होती है चारो और बसंत की और ऐसे में मिल बैठे दो फुरसतिये तो शाम का मजा दुगना हो जाता है| ऐसा ही हुआ उस शाम, मिल गये दो गुरु चेले| एक गुरु जो अपने कर्मो का मारा था, पहले तो पढ़ाई की नहीं, फिर बाप के धंधे से नफरत और उस पर बुरी लत, वही सिगरेट-बीडी, गुटखा-पान| पर गुरु में थे गुरु वाले लक्षण, जबानी का तजुर्बा, बाप की फटकार, और किस्मत की मार| और एक चेला, अभी नये नये खिले थे ये भी और ठलुओ के पार्टी के ब्रांड न्यू सदस्य थे, उस पर किस्मत का कहर गुरु मिले तो भी यही, कॉलेज से छुट कर करके बाप की फटकार से बचने आते थे अड्डे पर, कश लेना तो बहाना था और यहीं प्रथम मिलन हुआ गुरु-चेले का, और धीरे धीरे मित्रता गहराती रही| वैसे कहानी तो ये पड़ोस की ही लगती है, है ना| तो दोनों साले ठलुआ को काम धाम कुछ नहीं, कश पे कश और फिजूल की बहस| अक्सर कस्वो में मिल जायेगें आपको ऐसे आवारा, जिन्हें दुनियां प्यार से “निठल्ला है बेचारा” कहती है, और गुस्से में “चुप वे ठलुऐ”|
अब पाठक सोचे में होंगे, के जनाब लेखक महोदय आप में न तो अक्ल है और न समझ, क्यू मौसम की बैंड बजाने पर तुले हुये हों यार, वसंत का मजा क्यों खराब कर रहे हों, अरे ये तो वों का वक्त है, जब मिलते है दो जबां दिल और बनती है प्यार की कहानियाँ, और एक आप है दिल-बिल तो गया तेल लेने, मिला दिया ठलुओं को, अब चरेंगे एक दूसरे का दिमाग और करेगें हमारा वक्त बरबाद| तो मित्रों मैं आपको एक बात बताता हूँ, कभी कभी इन निठल्लों की बकबास में बड़ी गहरी बात होती है| खैर छोडिये, हम आते है ठलुआ मिलन पर|
तो साहब दोनों ठलुए यू तो अक्सर मिलते रहते थे, पर आज तो कुछ खास था| एक तो वसंत उस पर ठंडी पवन, और उस पर चेले के मन में मचलते प्रश्न, फिर अड्डे पर सन्नाटा और उठने लगा ज्वार भाटा| तो चेले ने भूमिका बनाते हुये गुरु से कहा, “गुरुदेव, यार आज कल दिल नहीं लगता और बाप भी कुछ ज्यादा फटकारने लगा है|”
गुरु बोला,” अवे साले एक बात बाताओ तुम, ये बाप का फटकारना तो समझ आता है पर तुम्हारे दिल का न लगना समझ नहीं आता, अवे दिल ना हुआ साले ढक्कन हों गया, लग नहीं रहा??”
चेला बोला,” नहीं यार गुरु सच्ची, जब से वों शर्मा की लड़की को देखा है, तब से साला ना नींद आती है, न चैन, गुरु बस अजीब सा लगता है, लगता है साला शर्मा की लड़की हों और हम हों, बस बैठे और बतियाए|”
गुरु बोला,”बेटा हमें लग रहा है, तुम साले फस रहे हों प्यार-व्यार के चक्कर में, अवे मत जाओ साले, थोड़े बहुत काम के बचे हों, काम से चले जाओगे|
चेला बोला, “ अच्छा गुरु एक बात बताओ, जे प्यार आखिर होता क्या है??”
गुरु ने अपनी जेब से एक सिगरेट निकाली, जलाई और कश लेते हुये बोला, “बेटे प्यार कुछ नहीं होता, साले सब आदमी को निठल्ले बनाने के धंधे है, तुम न पड़ना इन चक्करों में, सुनों भुत-प्रेत, विघ्न-बांधा का इलाज है, ये प्यार का कोई इलाज नहीं है|
हेऐ गुरु, चेला शरमाते हुये बोला, “ ऐसा थोड़े होता है, कुछ तो इलाज होगा, वों शर्मा की लड़की आ जाये तो भी ना क्या इलाज होगा??”
गुरु फिर बोला,” सुन वे, लड़की आये चाहे ना आये, साले मरोगे तुम ही, अवे चाहे कद्दू गिरे छुरी पर चाहे छुरी कद्दू पर साले कटना तो कद्दू को ही है, साले हमें गुरु कहते हों, तो हमारे तजुर्बे से भी काम लिया करों, मान लिया करो बात को, अभी संभल गये तो ठीक, नहीं तो जिन्दगी भर भुगतना पढ़ेगा|
चेला बोला,” अच्छा गुरु सच बताना तुम्हे प्यार हुआ है कभी??”
गुरु चिल्लाया,” अबे मना कर रहे है तुमसे और तुम बके जा रहे हो, सिगरेट पियो और खिसको, तुम्हारे बाप को पता चला तो तुम्हे तो मारेगा ही, हमें भी गालियाँ देगा, और तुम्हारी कोई वेल्यु हों या न हों, हमें सब जानते है|”
चेला बोला,” ठीक है गुरु, तुम कहते हों मान लेता हूँ, लाओ सिगरेट दो|”
चेले ने सिगरेट ली और चुप हों गया| देर तक एक खामोशी रही अड्डे पर| फिर गुरु बोला,” अबे चेले एक बात बात बता, साले क्या होता है तुम्हे आजकल, मतलब फीलिंग कैसी होती है ???”
चेला चौका, “गुरु अभी तो तुम मना कर रहे थे, और अब तुम पूछ रहे हों, गुरु क्या चक्कर है ??”
गुरु बोला,”चल जाने दे यार ऐसे ही पूछ लिया”
चेला बोला,” गुरु बस ऐसे ही या कोई बात है, सच बताओ गुरु, तुम्हारी कसम किसी से नहीं कहुगा|”
गुरु बोला, “ यार हम देख रहे थे, तुम्हे भी वैसा ही होता है, जैसा हमें होता था?”
चेला बोला, “ गुरु तुम्हे भी होता था, मतलब तुम्हे भी प्यार था??”
गुरु बोला, “ हां था तो रे”
चेला बोला,” कौन थी गुरु, तुम तो छुपे निकले??”
गुरु बोला,” थी यार एक, अपने डाक्टर साब है न, उनके बगल में रहती थी, सनोबर नाम था उसका”
चेला बोला,” वाह गुरु, आप भी खेले खाए है, तो गुरु सुनायेगे नहीं सनोबर का किस्सा??”
गुरु बोला,” सुनायेगे क्यू नहीं यार, पर सुनने के लिये दिल होना चाहिये”
चेला बोला,”मतलब गुरु हमारे पास दिल ही नहीं, अरे आप सुनाइये तो, साला हम से बड़ा दिल है किसी का??”
गुरु बोला,” तो सुनों भाई, लेकिन शर्त ये है, की सुनने के बाद दिल में दफन कर लेना, नहीं साले हम से बुरा कोई न होगा, समझे?”
चेला बोला,” हां गुरु, अरे हमें भी इस शहर में रहना है, इधर सुना और उधर भूल गये|”
गुरु बोला,” तो सुनों..” और गुरु देव खो गये पुराने यादों में फिर बोले, “ बात उन दिनों की है जब हम ११वी पढ़ते थे, यही दिन चल रहे थे, वसंती, चारो और एक महक, फिर डाक्टर साहब के बगल में रहने आये, मेनेजर साहब, बैक में थे, दो लड़किया थी उनकी, एक हमारे साथ पढ़ती थी, नाम था सनोबर|”
चेला बोला, “फिर गुरु??”
गुरु बोला, “ अव्बे चुपचाप सुनों बस, हां तो नाम था सनोबर, तो हमने जब सनोबर को देखा, तो वों हमें कुछ खास लगी, बस दिल में घर कर गई, सोचा ...लड़की हों जिन्दगी में तो सनोबर जैसी, न कोई रंग रोगन, न कोई लाग लपेट, बस कुदरत की नयाब चीज| फिर सोचा के भाई लड़की तो देख ली अब इसे पटाया कैसे जाये|”
चेला बोला,” हेएन”
गुरु ने इस बार टोका नहीं, गुरु बोला,”हां, फिर हमने कर दिये आशिको वाले चोचले चालु, सनोबर जिधर हम उधर और उन दिनों हमारे पास साइकल हुआ करती थी, तो उठाई साइकल और निकल लिये, दो बढ़िया ब्रांड की बुशर्ट और दो जीन्स बस यही पहनते थे उन दिनों| क्या स्कूल और क्या कोचिगं सब जगह जलजला भाई का|
चेला अपनी उत्सुकता बढाते हुये बोला फिर गुरु बोला,”वाह गुरु, फिर ??”
गुरु ने कहना चालु रखा,” फिर हुआ ये, के एक दिन सनोबर ने हमें देखा, पहली नज़र पड़ी थी उसकी हम पर, भाई वों दिन तो हम तुम्हे बता ही नहीं सकते, बिजलियाँ गिरी बिजलियाँ, अंदर तक हिल गये, हालत तो ये थी की अब गये की तब गये|”
चेला उचका,” अच्छा फिर गुरु|”
गुरु बोला,” फिर तो मर ही गये, उसने मुस्कुरा दिया”
चेला बोला,”ओ तेरे की”
गुरु बोला,” हां रे, बस वों था आखरी दिन, हमारे काम के होने का, वों उधर मुस्कुराई और हम यहाँ खत्म, फिर दो चार दिन बाद दिया एक पत्र, इत्र में लपेट के लाल कागज पर, उसने पढ़ा भी हमारे समाने और फाड़ भी दिया और चली गई भुनभुना के, अब क्या बताए, हम तो डर गये, कहीं बाप से कह दे, उसका बाप तो मारेगा ही, हमारा बाप मरेगा भी और घसीटेगा भी, लेकिन कहा किसी से नहीं|
चेला बोला,”फिर गुरु”
गुरु बोला,”फिर क्या वे, बस अपना ढर्रा जो चल रहा था चलता रहा| फिर एक दिन मिल गई, स्कूल के पास, कोई नहीं था हम और वों, मौसम सुहाना था, हमने भी पकड़ लिया हाथ और बोल दिया “
चेला बोला,” क्या बोला गुरु ??“
गुरु सीना चौड़ा करते हुये बोला,” हमने कहा, सुनों यदि हमारी बात का जबाव नहीं दिया तो हम मर जायेगे|”        
चेला बोला,” फिर गुरु “
गुरु बोला, ‘ फिर वों कुछ न बोली, बस खड़ी रही, हमने हाथ छोड़ दिया, फिर धीरे से पूछा, क्या हुआ??, तो झील से दो मोती टपक गये, रों डी यार वों|”
चेला बोला,” मगर क्यों गुरु??”
गुरु बोला, “हमें पूछा क्या हुआ रों क्यू रही हों, बुरा लगा, माफ कर दो, हम सवाल पूछते रहे, वों न में सिर हिलाती रही और रोती रही, फिर हम से  न रहा गया, हमने कहा या तो तुम बता दो नहीं तो आज ही जान देदेगे हम अपनी|”
चेला बोला,” फिर गुरु”
गुरु बोला,” फिर वों बोली”
चेला बोला,” क्या बोली??”
गुरु बोला, “ वों बोली, वीर सिह, समझों हम मुसलमान है और आप हिंदू, हमारे अव्बू कभी नहीं मानेगे, हम कभी साथ नहीं रह पायेगें|”
चेला बोला,” फिर गुरु”
गुरु बोला, “ फिर हमने पूछा, तो तुम हमसे प्यार नहीं करती??”
चेला बोला,”तब “
गुरु  बोला,” बोली, प्यार तो हम आपसे ही करते है और करते रहेगें, पर यदि आपको हमसे प्यार है तो आप हमसे फिर कभी बात न कीजिएगा|”
चेला बोला,” तब तुमने क्या किया गुरु”
गुरु बोला,” नहीं की बात, हम प्यार करते है उसे”
चेला बोला,” गुरु बात तो करनी थी, शायद मान जाती??”
गुरु बोला. “नहीं रे बात तो उसकी भी सही थी, हम हिंदू और वों मुसलमान, बाप तो हमारा भी नहीं मानता|”
चेला बोला,” गुरु बात तो सही है तुम्हारी, ये धर्म-जात बनाई किसने, साले का मुह तोड़ देते है, न रहेगा बांस और न बजेगी बांसुरी|”
गुरु बोला,” हां यार,उसे तो आधी दुनियाँ के आशिक ढूंड रहे है|”
चेला बोला, “ गुरु कितनी अजीब बात है न, धर्म, मजहब, जात सब को जोड़ने के लिये बनाई, और इन्ही चीजों ने सब को बाँट के रख दिया|”
गुरु  बोला, “ हां यार, लेकिन अव क्या किया जाये, सब को कौन समझाए??”
चेला बोला, “ जाने दो यार गुरु, जो हों गया तो हों गया, तुम सिगरेट पियों....लों “
गुरु ने सिगरेट के दो कश लिये और जाने लगा|  
चेला बोला, “ गुरु जाते जाते एक बात और बताते जाओ, हम ये साला प्यार करें की नहीं?????”
गुरु बोला,” कर लों वे”
चेला चौका,” गुरु क्या कह रहे हों कर लों???”
गुरु बोला,” हां कर लों वे, यही तो एक चीज है जो हमेशा साथ रहती है”
और गुरु चला गया ..................
~ ©अमितेष जैन                

कहानी : आत्मसम्मान


राहुल सो कर उठा, अपनी बालकनी पर जा कर, सिगरेट जलाई और देखने लगा घर के सामने वाली सड़क को| देख रहा था सब काम पर जा रहे है, कोई हाथ में लंच लेकर, कोई मोबाइल पर बात करते हुये, कोई भागते भागते, कोई किसी का इन्जार करते हुये, कोई बार बार घड़ी देख रहा था, राहुल ने  एक घृणित मुस्कान के साथ  सिगरेट का एक और कश लिया|  आज राहुल को ऑफिस की को चिंता न थी, कल ही तो नौकरी को लात मार कर आया था| फिर सोचने लगा चलो आज घर चलते है फिर सोचा रहने दो यार घर जाकर क्या कहुगां के नौकरी छोड़ दी, राहुल ने एक और कश सिगरेट का लिया| और फिर  सोचने लगा, राहुल घर में सबसे छोटा था तीन बड़ी बहनों का अकेला भाई, बहनों की मांगे पूरी हो या न ही राहुल की हर बात का ध्यान रखा जाता था, पिता सरकारी नौकरी में, तनखाह कुछ ज्यादा न थी फिर भी तीन बहनों की शादी की, राहुल को पढाया, उस पर माँ की बीमारी जाने कैसे किया होगा उन्होंने सब, राहुल ने सिगरेट का एक कश और लिया| फिर सोचा अभी साल भर पहले ही तो शादी हुई है अभी अभी एक नन्हा-मुन्हा घर में आया है उसे भी पढ़ाना है, बीबी की भी देखभाल करनी है  ये महीना तो जैसे तैसे निकल जाएगा फिर क्या करुगा, राहुल ने सिगरेट का एक कश और लिया| और किर सोचने लगा, अरे कल किया  ही क्या था मैंने यूँ ही चीखने लगा वों टकला बॉस मुझ पर, छोटी मोटी गलतियाँ तो ओटी ही रहती है और कल से पहले तो मुझसे कोई गलती भी नहीं हुई और ये गलती भी मेरी कहाँ थी, शर्मा ने ने फ़ाइल नहीं दी समय पर नही तो उसे भी खत्म कर देता, और इस से पहले कभी मेरा काम अधूरा रहा है? राहुल ने सिगरेट का एक और कश लिया| फिर सोचने लगा यार  घर भी तो चलाना है पापा क्या सोचेगे?, बीबी से क्या कहुगां?, माँ की हालत भी बिगड़ती जा रही है और आस पास के लोग तो सवाल पूछ पूछ कर ही मार डालेगें, राहुल ने एक कश लिया| फिर सोचा अब मेरा भी कोई आत्मसम्मान है के नहीं फिर बॉस घिच घिच करेगा, दूसरी जॉब ढूँढ लेता हूँ, पर वों भी क्या आसानी  से मिल जायेगी, अभी तो जैसे तैसे मिली थी भाग भाग के हालत खराब थी, और मिल भी गई तो क्या वहाँ ऐसा सलूक नहीं होगा, राहुल ने एक और कश लिया| कुछ सोच और अपने लोअर की जेब से मोबाइल निकाला, टकले बॉस को लगभग गाली देते हुये फोन किया| 
'हल्लो'
'सर गुड मोर्नींग'
'हां राहुल कहो'
'सर कल के लिये सॉरी'
'क्यू क्या हुआ, आ गई अकल ठिकाने पर, कल तो बड़ा फूल रहा था तू, सुन तेरे जैसे सत्तर आते जाते है यहाँ, क्या बोला रहा था ऐसी सौ नौकरी मिल जायेगी'
'सर बोला ना सॉरी, कल जरा गुस्सा आ गया था'
'अवे अपना गुस्सा अपने पास रख, और सुन यदि काम करना है तो सुनना भी पढ़ेगा और गाली भी खानी पढ़ेगी, साले तुम जैसे लोगो से जरा प्यार से क्या बोल लिये, चढ़ गये ऊपर'
'सर सॉरी अब गलती नहीं होगी'
'ठीक है, लेकिन अब कुछ किया तो साले कहीं और भी जॉब नहीं कर पायेगा और सुन तेरे जैसे लोगो का कोई आत्मसम्मान नहीं होता, घर छोड़ के आया कर सेल्फ-रिसपेक्ट,आ जा और टाइम पर '
'थैंक्स सर'
'इट्स ओके'
राहुल ने फोन काटा , सिगरेट का आखरी कश लिया, राहुल का पूरा शरीर जल रहा था, आँख में आसू लिया, किस्मत को कोसते हुये, बाथरुम में घुस गया| अपने जले हुये आत्मसम्मान के निशान धोने...........

Thursday, 3 May 2012

कहानी : भीख



"ए दो रुपया दें" बुडिया ने कहा | "चल आगे" राज ने कहा |
"बेटा भगवान तेरा भला करेगा" बुडिया ने कहा |
"बोला न बुडिया चल आगे" राज कुछ और बिगड़ कर ने कहा |
"बेटा ऐसे नाराज़ नहीं होते, दो रूपया दे चाय पियुगी" बुडिया ने फिर कहा|
"एरे तू जाती है नहीं, आ जाते है मागंने भिखारी कंही के, चल जा कंही और जा के मांग" राज लगभग चीखते हुये कहा ने कहा और इतनी जोर से के आस पास के लोग उसे देखने लगे |
ठीक है बेटा, भगवान तेरी हर मुराद पूरी करे, तू बड़ा आदमी बने’ बुडिया ने डरते हुये कहा और जाने लगी |
राज सोचने लगा |
जिंदादिल और हँसमुख राज को वैसे कभी गुस्सा नहीं आता था| पर आज उसका दिमाग सुबह से ही खराब था| दो दिन पहले मुम्वई आया था नौकरी कि तलाश में | दो साल हुये पढाई पूरे किये | कोई काम नहीं मिला | ऐसा नहीं था की वों न कमाए तो उसका परिवार मर जाएगा, पिता की अच्छी नौकारी है, अपना घर है, कोई खास परेशानी नहीं | पर हर पिता की तरह राज के पिता का भी बस यही सपना है, की राज अपने पैरों पर खड़ा हो जाए, इसलिये उस पर कुछ ज्यादा दबाब डालते है| और यही हाल माँ का है वों हमेशा राज का साथ देती है, पर पिता के रोज रोज दिये जाने वाले तानों ने माँ को भी ऐसा कर दिया था की वों भी पिता की हां में हां मिलाने लगी थी और राज को जब चाहे डाट देती थी| लगभग सभी दोस्त कुछ न कुछ काम धंधा करने लगे थे | और अब तो हालत ये थी की राज के पास कोई नहीं था जिससे वों बात भी कर सके|
                              अभी चार दिन पहले राज के पिता के एक मिलने वालो ने बताया की उनकी कोई जान पहचान है मुम्वई में जहाँ राज को काम मिल सकता है| और राज आगया मुम्वई, वैसे ऐसा नहीं था की राज को आता जाता ही न था पर जहाँ साक्षात्कार था वहाँ बात न बन सकी, क्यों की काम कुछ अलग था और राज ने कुछ और पड़ा था| जब माँ और पिता को पता लगा की वहाँ भी कुछ काम नहीं मिला तो वों राज को फिर सुनाने लगे खरी खोटी| राज चुप रहा कुछ न बोल सका, बस अब तो उसे लगता था की सुनना उस नसीब बन गया है| जो है वों उस बेचारें बेरोजगार को पहले आपनी शौर गाथाएँ सुनाता फिर राज को उसकी नाकामयाबी पर भाषण|
                           बस इसी परेशानी के साथ राज स्टेशन पर बैठ कर अपनी गाड़ी की प्रतीक्षा कर रहा था और वों भिखारन आ गई, अपनी कुंठा में राज उस पर चिल्ला उठा | पर जाते जाते जो उस भिख्रण ने बोला राज के दिल को छु गया| जब सभी उसे नाकारा और बेकाम समझकर उसपर चिल्लाते है तो उसे कैसा लगता है और बुडिया ने उसके डाटने के बाद भी उसे आशीर्वाद दिया| राज भर उठा| उसने आस पास देखा | बुडिया अब भी बहीं थी | राज के पास बैठे एक और यात्री से भीख मान रही थी | राज बुडिया के पास गया और बोला “ चाय पियोगी अम्मा “
भिखारन ने डरते सहमते हुये अपना सिर हां में हिलाया |
राज में भिखारन को चाय खरीद के दी |
भिखारन ने भी राज को विना कुछ बोले धीरे से हाथ उठाकर आशीर्वाद दिया|
जिससे राज को जाना था वों गाड़ी आ चुकी थी| राज ने अपनी बर्थ पर सामान रखा| कम्बल निकाल कर सिर से पैर तक खुद को ढक लिया| आँखों में आसू लिये राज कब सो गया उसे भी पता न लगा|

Friday, 27 April 2012

व्यंग कथा : मेरी प्रथम काव्य गोष्टी


दोस्तों, आज आपके सामने पेश है मेरी प्रथम काव्य गोष्टी की रिपोर्ट....
मेरे शहर के पास के एक कस्वे से बुलावा आया| बुलावा भेजा था वहाँ के एक साहित्यकार जी ने| सुबह फोन बजा, उठाया मैंने,
उधर से आवाज आई....”नमस्ते भाई कैसे हो”,
मैंने कहा, “बढिया ....”
साहित्यकार जी ने कहा,”आज शाम को आजाओ एक गोष्टी है”
मैंने कहा, “जी .. ”
साहित्यकार जी ने कहा,”सही शाम ७ बजे पहुच जाना ... ”
मैंने कहा, “जी .. ”
साहित्यकार जी ने कहा,”घर तो देखा है ... ”
मैंने कहा, “जी ”
साहित्यकार जी ने कहा,”फिर मिलते है शाम को ... ”
मैंने कहा, “बिलकुल .... ”
साहित्यकार जी ने कहा,”वों फलां फलां भी आ रहे है .. ”.
मैंने कहा, “अच्छा .. ”
साहित्यकार जी ने कहा,”उन्हें भी लेते आना ”
मैंने कहा, “जी ”
साहित्यकार जी ने कहा,”ठीक है ...रखु .. ”
मैंने कहा, “जी”
तो जानाब यहाँ नया नया रोग था, मन तो हिरणों से ऊची छलागें मारने लगा, आखें घड़ी घड़ी, घड़ी देखने लगी, चार पाँच उच्चकोटि की कविताएं, दो चार ग़ज़ल याद की गई, एक कुर्ता, एक घड़ी की व्यवस्था की गई, दाड़ी ऊड़ी बना बनू के, एकदम चकाचक|
पहुचे साहब कस्वे में , घड़ी देखी, ६:३० हुये थे, हमारे साथ जो फलां फलां थे, बोले,”देखो दोस्त ७:४५ से पहले मत जाना, नहीं तो कोई इज्जत नहीं रहेगी|”
मैंने कहा,”पर समय तो ७ बजे का है”
फलां फलां बोले,”उससे क्या,बेटा अब तुम साहित्यकार बनने जा रहे हो, और समय पर पहुचकर क्यों अपनी इम्पोट्स घटा रहे हो, चलते है मिया एक आध फुक्की-सुक्की हो जाये|”
मैंने कहा,”जी जैसा आप कहें|”
फलां फलां बोले,”तो चलो, चौरसिया की दुकान पर”
मैंने कहा,”जी”
तो जनाब, चौरसिया की दुकान पर फलां फलां कश लेते रहे और हम उनकी बातो का रस लेते रहे| फिर ७:३० पर आदेश हुआ, चलो अब चलते है और हम चल दिये उनके साथ |
फलां फलां के प्लान के अनुशार हम सही ७:४५ पर खड़े थे, साहित्यकार जी की चौखट पर, साहित्यकार जी, पूरी श्रद्दा से स्वागत को आतुर, पहुचते ही बोले, "अरे देर हो गई आप लोगो को"
फलां फलां बोले," इतना तो चलता है"
और दोनों हँस दिये, हम भी मुस्कुरा दिये
साहित्यकार जी बोले, "चलिए अंदर चलिए"
और साहब चल दिये हम अंदर, अंदर था एक गुफा नुमा कमरा, कमरे में एक टेवल पर सरस्वती माता विराजमान थी, और फर्श पर चार अन्य मित्रगण, दो मित्र अपने मोबाइल पर आपस में बिलुटूथ पर कुछ आदान-प्रदान कर रहे थे, और जो दो और थे वों, किसी सांसद की माँ, बहनों की सेवा कर रहे थे|
पहुचते ही साहित्यकार जी ने परिचय कराया, और फिर सब लग गये अपने कामो में, मैं और फलां फलां एक किताब को खोलकर ग़ज़लें पड़ने लगे| इतने उस गुफा की मांद में दो अन्य का प्रवेश हुआ, साहित्यकार जी ने परिचय कराया और सरस्वती माता के पास जाकर बोले
"दोस्तों आप जानते ही है, आज हम यहाँ क्यू उपस्तिथ है"
उनका इतना कहना ही था की बत्ती गुल यानि की बिजली गई| इसके बाद सब ने बारी बारी से बिजली वालो को याद किया, और हिन्दी की सहायक क्रियाओं से उन्हें नवाज़ा| और फिर साहित्यकार जी को भी लगे हाथ दो चार सुना डाली| साहित्यकार जी भी कम तो थे नहीं उन्होंने भी सहायक क्रियाओं के अपने ज्ञान का उदाहरण प्रस्तुत किया और मैंने सोचा भाई क्या फायदा हुआ चकाचक आने का| फिर एक दीपक और कुछ मोमबत्तियाँ मंगाई गई और उस केंडल लाईट माहौल में गोष्टी को प्रारम्भ किया गया|  साहित्यकार जी फिर बोले, " मैं आज की गोष्टी का फलां फलां को आमंत्रित करूगाँ के वे आये, और और दीप प्रज्जोलन कर गोष्टी का आरम्भ करे|”
फलां फलां बोले,” दीप तो पहले से ही प्रज्जोलित है साहित्यकार जी|” साहित्यकार जी फिर बोले, “ मेरा मतलब माता के चरणों के समक्ष दीप प्रज्जोलन से था|” फलां फलां बोले,” वों तो ठीक है, पर मुख्य अतिथि और विशिष्ट अतिथि को और बुलाइए|”
हाँ, साहित्यकार जी कुछ सोचकर बोले,” मैं श्री मित्र नंबर एक से गुजारिश करूगां कि वे भी दीप प्रज्जोलन में सहियोग करें और मुख्य अतिथि का पद स्वीकार करें|”
मित्र नंबर एक तत्काल ही बोले, “साहित्यकार जी  अरे हम काहेके अतिथि हम तो आप के घर के सदस्य है, और आप कृपा कर श्री मित्र नंबर दो को मुख्य अतिथि बनाये|” साहित्यकार जी फिर बोले, “ ठीक है मैं श्री मित्र नंबर दो से अनुरोध करूगां कि ....” साहित्यकार जी की बात पूरी भी न हो पाई थी की श्री मित्र नंबर दो बोल पड़े,” यानी की साहित्यकार जी आप मुझे अपने घर का सदस्य नहीं मानते|”
साहित्यकार जी फिर बोले,” अरे मानता क्यूँ नहीं पर गोष्टी ...”
साहित्यकार जी की बात फिर आधूरी रह गई, श्री मित्र नंबर दो फिर बोले,” अच्छा अच्छा ठीक है पर मित्र नंबर एक यदि विशिष्ट अतिथि के रूप में यदि साथ आये|” इतना कहकर वे उठे और साथ में मित्र नंबर एक भी उठे, और हँसते हुये माता के समक्ष जा खड़े हुये, जैसे तैसे दीप प्रज्जोलन हुआ|
फिर साहित्यकार जी बोले, “मैं संचालन के लिये श्री मित्र नंबर तीन को आमंत्रित करता हूँ|” मित्र नंबर तीन अपनी जगह पर बैठे बैठे बोले,” साहित्यकार जी सरस्वती वंदना के लिये किसे आमंत्रित करूँ??”
साहित्यकार जी बोले, “यार किसी को भी आमंत्रित कर लों|”
इतने में फलां फलां बोले, “ यार संचालन तुम कर रहे हो या साहित्यकार जी??” मित्र नंबर तीन बोले, “ ठीक है .....मैं मित्र नंबर चार से कहुगां की वे सरस्वती वंदना करें|” इस पर मित्र नंबर चार ने बिगडते हुये कहा, “क्या यार तुम भी संचालन तो आता नहीं, कहुगां मतलब क्या, अनुरोध करुगा|”
मित्र नंबर तीन बोले, “ हां हां बही, अनुरोध करुगा|”
मित्र नंबर चार ने नानुकर करने की बाद एक सरस्वती वंदना गाई, सब ने तालियाँ बजाई, और फिर संचालक महोदय बोले,’’ साहित्यकार जी अब रचना पाठ के लिये किसे आमंत्रित करूँ”
फलां फलां फिर बीच में बोल पड़े,” यार फिर बही बात, संचालन तुम कर रहे हो या साहित्यकार जी???”
मित्र नंबर तीन बोले, “ ठीक है मैं मित्र नंबर पाँच से अनुरोध करूगां (ये शब्द उन्होंने थोड़ा जोर देकर मित्र नंबर चार की और देखते हुये कहे) कि वे प्रथम काव्य पाठ करें|”
मित्र नंबर पाँच (थोड़ा चौककर) बोले.” यार तुम भी न बस, टेम तो देखते नहीं, अरे में ये फ़ाइल ट्रांसफर कर रहा हूँ, ये तो हो जाने देते|”
इतने में साहित्यकार जी बोले, “ क्या यार तुम साले, फ़ाइल ट्रांसफर करने आये हो या काव्य पाठ करने??”
मित्र नंबर पाँच बोले,” चलो मैं काव्य पाठ कर देता हूँ, फ़ाइल ट्रांसफर तो होती रहेगी, बिलुटूथ का ये ही तो फायदा है””
एकदम से मित्र नंबर छ: बोल पड़े,” यार तुम्हारे मोबाइल में बिलुटूथ है, कौन सा मोबाइल है, कितने का लिया??”
मित्र नंबर पाँच बोले,”मेरे साले का है, एन सीरीज का”
मित्र नंबर छ: बोले,”बताना जरा“
मित्र नंबर पाँच बोले,” अभी डाटा सेंड हो रहा है| “
फलां फलां ने बीच में टोका,”यार हम काव्य गोष्टी के लिये आये है मोबाइल देखने नहीं|”
मित्र नंबर पाँच ने फिर कुछ ना कहा और वीर रस की दो कविताएं पढ़ डाली, संचालक महोदय को देखा और मोबाइल हाथ में लिया|
संचालक महोदय ने धन्यावाद दिया, और बोले,” अब मैं मित्र नंबर एक से अनुरोध करूगां की वे काव्य पाठ करें|”
फिर क्या था संचालक महोदय अनुरोध करते रहे और काव्य पाठ होते रहे, और आब बारी मेरी थी|
मैंने जैसे ही मुह खोला बिजली आगयी| सब एक साथ बोले वाह वाह, तभी साहित्यकार जी बोले, “कुछ कहने तो दो बालक को, वाह वाह फिर करना”
इस पर फलां फलां बोले, “साहित्यकार जी आप टेसू के टेसू रहोगे, अरे बिजली आई है, जश्न तो बनता है|”
इस पर संचालक महोदय ने तुर्रा छोड़ा,” साब ऐसा जश्न तो हम दिन में दस बार बनाते है”
इस पर सब फिर बोले,”वाह वाह”
फलां फलां ने मुझ कहा, “तुम चालु करो यार मुझे भूख लगी है”
मित्र नंबर एक उचके, “ कविता की??”
फलां फलां फिर बोले,” यार टीम चुप रहो, उलटी बात ही करोगें|” फिर मेरी ओर देखते हुये “ तुम बोलो यार|”
मैंने भी जल्दी से काव्य पाठ चालु किया कि और कोई कुछ न बोल पाए| काव्य पाठ खत्म हुआ ही था की साहित्यकार जी ने आदेश दिया “पहले पेट पूजा फिर काम दूजा” तब तक चाय और पकोड़े आ चुके थे, सभी ने नाश्ते का लुफ्त उठाया और फिर  संचालक महोदय तन के बैठ गये एक डकार ली और बोले,” अब मैं आमंत्रित करुगा श्री फलां फलां को”
जब श्री फलां फलां पर सब की नज़रे पड़ी तो फलां फलां ऊँघ रहे थे
संचालक महोदय फिर जोर से बोले,” फलां फलां जी, अरे सुन रहे हो??”
फलां फलां झटके से उठे और बोले, “ वाह वाह”
संचालक महोदय बोले, “ वाह वाह बाद में करना फिर रचनाएँ सुनाओ”
फलां फलां ने कहा, “ठीक है|” अभी फलां फलां पहला मिसरा ही पढ़ रहे थे कि मित्र
नंबर छ: बोले,” यार ये तो राना जी का है”
फलां फलां बोले,” सुन तो लों यार”
मित्र नंबर छ: बोले,” तो अपना सुनाइये”
फलां फलां बिगड़ गये, ”नहीं सुनाना वें, करले क्या करेगा, साहित्यकार जी अबके यदि ये आया तो मुझे मत बुलाना, गोष्टी खत्म भाई चलो सब अपने अपने घर को”
साहित्यकार जी बोले, “अरे नाराज ना होइए|” फिर मित्र नंबर छ: की ओर देखते हुये बोले, “तुम चुप रहो यार|”
मित्र नंबर छ: ने आव देखा ना ताव और उठे और चल दिये गुफा से उनके पीछे पीछे मित्र नंबर चार और पाँच भी ये कहते हुये निकल लिये, “ अरे सुनों यार, बात तो सुनों ...”
फलां फलां जो पहले से गुस्से में थे बोले,” सारा मूड खराब कर दिया दिया” और फिर सहायक क्रियायों का इस्तमाल किया और उठ खड़े हुये और मुझसे बोले चलो यार तुम यहाँ आना ही नहीं चाहिये था, जनाब बहुत रोका सबने पर वे ना माने और काव्य गोष्टी का समापन हो य गया|
मैं और फलां फलां, अभी थोड़ी दूर तक ही आये थे के मिल गये मित्र नंबर छ;, चार और पाँच,  मित्र नंबर छ; फलां फलां से बोले, “चले चौरसिया की दुकान पर” और लगाया एक ठहाका सब ने| और निकल पढ़े सब के सब  चौरसिया की दुकान पर कश का रस लेने”
~ ©अमितेष जैन